गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

आक्सीजन के लिए हाहाकार

आक्सीजन के अभाव में दम तोड रहे मरीज

देश में कोरोना की दूसरी लहर ने आक्सीजन के अभाव में मरीजों को दम तोड़ने पर मजबूर कर दिया है

विभिन्न राज्यों से कोरोना मरीजों का आक्सीजन के अभाव में दम टूट रहा है जिस पर विडंबना ये कि हम विश्व में आक्सीजन निर्यात करने वाले सबसे बड़े निर्यातक है। 

आखिर ये स्थिति आई कैसे?

आक्सीजन के सबसे बड़े निर्यातक को 50 हजार मिट्रिक टन आक्सीजन आयात करनी क्यों पड़ रही है? इसे मिस मैनेजमेंट कहा जाए या  जानबूझ कर  की गई लापरवाही। हमें ये आभास ही नही था कि देश में आक्सीजन के लिए इस तरह हाहाकार मच सकता है हम आक्सीजन का निर्यात दुगना करते रहे पिछले साल जहां हमनें  4500 मिट्रिक टन इंडस्ट्रियल आक्सीजन निर्यात की वहीं इस साल जनवरी तक 9000 मिट्रिक टन निर्यात की। हमारे सत्ताधारी नेता कहते है कि जो आक्सीजन निर्यात करते है वो इंडस्ट्रियल आक्सीजन है जबकि  इसे मेडिकल आक्सीजन में बदला जा सकता है।

प्रश्न ये है कि जब इंडस्ट्रियल आक्सीजन को मेडिकल आक्सीजन में बदला जा सकता है तो फिर हमनें ये तैयारियां क्यों नही रखी। और तो और पूरे देश में आक्सीजन सप्लाई करने वाले टैंकर भी सिर्फ 2000 ही है। क्या ये 135 करोड़ देशवासियों के लिए पर्याप्त है? क्या हमें दूसरी लहर के आने पर अपने इंतजाम पूरे नही करने चाहिए थे ? 

प्यास लगने पर कुआं खोदने की आदत 

हमनें इस ओर ध्यान दिया ही नहीं।  आफत आने पर कुआं खोदने की हमारी प्रवृति ने लाखों लोगों की जान पर ला दी। अब हम इंडस्ट्रियल आक्सीजन को भी मेडिकल आक्सीजन में बदलने के निर्देश दे रहे है तो निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा रहे है इसके अलावा आक्सीजन का आयात भी करने के आर्डर दे रहे है। लेकिन जिस प्राणवायु के 2 सेकेंड के लिए भी बाधित होने पर मरीज की जान पर बन आती है उसके लिए दिनों इंतजार करने तक तो हज़ारों लोग काल कलवित हो जाएं तो आश्चर्य कैसा ?  

केंद्र सरकार करती है नियंत्रित आक्सीजन सप्लाई

देश में जितने भी आक्सीजन उत्पादन इकाईयां है इनका नियंत्रण केंद्र सरकार करती है। वह ही तय करती है की किस राज्य को कितनी आक्सीजन सप्लाई करनी है। कितनी इंडस्ट्रियल और कितनी मेडिकल आक्सीजन उत्पादित होगी और किस तरह उसका वितरण होगा?

हमारा डिजास्टर मैनेजमेंट फेल

 अब अगर केंद्रीय डिजास्टर मैनेजमेंट सबल होता और सीरी की रिपोर्टों को गंभीरता से लिया जाता तो आज ये स्थितियां नहीं आती। हमनें न तो सीरी की रिपोर्ट को तवज्जो दी और न ही आपातकाल में डिजास्टर मैनेजमेंट की तकनीक का इस्तेमाल ही किया।

भावी संकट की हमें जानकारी थी लेकिन हमनें ये नहीं सोचा था कि एक दिन में 3 लाख लोग भी कोरोना पॉजिटिव आ सकते है लेकिन डिजास्टर मैनेजमेंट ही तो हमें ये बताता है कि संकट के लिए हमें कैसे व्यवस्थाएं करनी है लेकिन हमने या तो इस ओर ध्यान दिया ही नही या फिर हमारा डिजास्टर मैनेजमेंट इतना निकम्मा है कि उसके संकट के समय हाथ पांव फूल जाते है।

हमारे नेता अपने अपने हिसाब से बयान देते है सत्ताधारी नेता अपनी सरकार का पक्ष लेते है तो विपक्ष के नेता अपने हिसाब से।  जबकि देश की जनता पर जब संकट हो तो हर नेता को ईमानदारी से पक्ष विपक्ष को भूलकर वास्तविक स्थिति को देश के सामने रखना चाहिए ताकि उसकी कमियों को दूर किया जा सकें।

शनिवार, 17 अप्रैल 2021

लौट आया कोरोना

 

लौट आया कोरोना

जी हां, कोरोना फिर से लौट आया है। पिछले साल मार्च में ही इसने अपना पहला कदम रखा था  अब ये एक साल का होकर दौड़ने लगा है। जी हां इसकी रफ्तार पिछले साल से दुगुनी है और कहीं कहीं तो ये तिगुनी चौगुनी रफ्त्रार से भागने लगा है।


क्या उपाय किए हमनें ?


 जब ये लौट ही आया है तो हमें आंकलन तो करना ही पड़ेगा कि जब विश्व के दूसरे देशों में ये दूसरी लहर के रूप में फैल रहा था तो हमने अपने देश में क्या उपाय किए?  हमनें वेक्सिन तो बना ली लेकिन उसका भंडारण नही किया हमनें दूसरे देशों को बांटकर अपने बड़े होने का अहसास कराया। पी पी ई किट का उत्पादन शुरू किया लेकिन जरूरत जितना उत्पादन भी हम कर पाए या नही ये आने वाले दिनों में सामने आ जाएगा।

हमनें वेंटीलेटर का उत्पादन भी शुरू किया लेकिन उनमें से 90%  काम ही नहीं कर रहे। हमनें  पहले दौर में रिमेडिवर दवा की कमी को पूरा किया लेकिन दूसरे दौर में भी ये दवाएं कम ही पड़ रही है।


तो फिर हमनें तैयारी क्या की?


हमने तैयारी की चुनावों की, हमनें तैयारी की कुंभ की, हमने तैयारी की राममंदिर के निर्माण की, जिस जिस की तैयारिया की वे सब चल रही है। चुनाव हो रहे है, कुंभ चल रहा है, राम मंदिर की नींव पड़ रही है। यानी जिन जिन चीजों की हमने तैयारियां की वे सफलता से हो रही है।


हमनें तैयारी नही की दूसरी लहर पर आने पर उसके लिए क्या करना है उसकी? आज स्थिति ये है कि जिस तेज रफ्तार से ये लौट आया कोरोना फैल रहा है  उसकी रोकथाम के लिए न हमनें अस्पतालों में बिस्तर बढ़ाए न वेंटीलेटर न टीकाकरण के लिए पर्याप्त टीको का स्टॉक ही रखा। हमारी तैयारियां ही नहीं थी कि अगर दूसरी लहर आई तो वो कितनी खतरनाक हो सकती है। हमनें न आक्सीजन उत्पादन के कोई प्रयास किए अगर किए होते तो आक्सीजन आयात नहीं करनी पड़ती। न हमने दवाइयों का स्टॉक ही रखा और न ही हमने विकट परिस्थितियों के लिए कोई तैयारी ही की। हमने तो सोचा अब गया कोरोना अब वह हमारे देश में तो आ नही सकता इसलिए हमने बेफिक्र होकर चुनाव कराएं, हमने बेफिक्र होकर अपने टिके दूसरे देशों को बांटे और तो और हमने बेफिक्र होकर कुंभ के स्नान भी कराएं जैसे है इस बीमारी से अजेय हो गए।


अब जब पिछले साल के आंकड़े भी बौने लगने लगे है तो हम कुंभ को भी प्रतिकात्मक करने की सलाह दे रहे है, हम दो गज दूरी की भी सलाह दे रहे है और तो और  पिछली बार की तरह ही फिर से लॉक डाउन भी कर रहे है। फिर एक बार देश में हड़बड़ी मच रही है, मजदूर पलायन कर रहे है। लोग अपने गांवों को लौट रहे है ये सोचकर कि न जाने कब पिछली बार की तरह लंबा लॉक डाउन हो जाएं।


हमने सबक कुछ सीखा ही नही


वास्तव में अगर हम विवेचन करें तो लगता है हमने न तो पिछले अनुभव से कुछ सीखा और न ही जब दूसरे देशों में दूसरी लहर चल रही थी तब अपने यहां कोई तैयारी रखी। फिर वही अस्पतालों में बिस्तर की कमी, वही आक्सीजन के अभाव में मरते कोरोना मरीज, वही अस्पतालों में वेंटीलेटर का अभाव फिर वही शमशानो और कब्रिस्तानों में अंतिम संस्कारों की लाइन, पहली लहर से भी ज्यादा मरते लोग। 


आखिर हमने पिछले एक साल में किया क्या? 


ईमानदारी से अगर हम विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि हमने पिछले एक साल में दावे किए वेक्सिन बनाने के लेकिन जरूरत के समय वो भी कम पड़ गई। हमने दावे किए वेंटीलेटर बनाने के लेकिन फिर भी वे अस्पतालों में नही पहुंचे और अगर पहुंचे भी तो उन्हे आपरेट करने वाले लगाए ही नहीं,  हमने दावे किए सभी व्यवस्थाएं कर लेने की लेकिन दूसरी लहर के शुरुआत में ही हमारे हाथ पांव फूलने लगे है।


सोचना देश को है कि हमने क्या खोया और क्या क्या खो सकते है? क्योंकि हमारी तैयारियां और दावों की तस्वीर हमारे सामने है ।

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया के नाम आम नागरिक की पाती

 


मेरे देश के प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मालिकों, आपको ये पाती ऐसे समय (आम नागरिक) लिख रहा हूं, जिस समय देश के मीडिया को लोकतंत्र की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने की जरूरत है,आप द्वारा दिखाई जाने वाली खबरों से देश की जनता लोकतंत्र की दशा व दिशा तय करती है, ऐसे समय में चौथे स्थंभ की जवाबदेही ज़्यादा हो जाती है। 

सोशल मीडिया पर जिस तरह के प्रचार हो रहे है उससे जनता असमंजस में है , तरह तरह की अफवाहें आम नागरिक को भृमित कर रही है, आज आम नागरिक ये समझ नही पा रहा कि सोशल मीडिया व मीडिया द्वारा दिखाई जा रही  खबरें कितनी विश्वनीय है, कई चैनल किसी एक राजनैतिक दल के लिए काम करते दिखाई देते है तो कुछ किसी अन्य के पक्ष में। चैनलों पर जो चर्चाए हो रही है उनका कोई निष्कर्ष नही निकलता।

 क्या चैनल टाइम पास कर रहे है? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की ये जिम्मेदारी है कि वो जनता को पूरी ईमानदारी से निष्पक्ष रहकर जनता को सच्चाई से अवगत कराएं। मीडिया को सरकार की उन कमियों को उजागर कर जनता को जागरूक करना चाहिए जिनमे सरकार कोई गलत कदम उठाती है, जबकि आम नागरिक इस समय ये महसूस कर रहा है कि कुछ चैनल तो केवल सरकारी भोपू बन रहे है। 

सरकार के अच्छे कदमो की जहां प्रंशशा होनी चाहिए वहीं गलत कदमों की खुल कर आलोचना भी करनी चाहिए, तभी लोकतंत्र की रक्षा संभव होगी, जिसमे चौथे स्तंभ की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है।

क्या हमारे देश का मीडिया विश्व स्तरीय विश्वसनीय नही होना चाहिए? आज इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया की देश मे बाढ़ आई हुई है कोई चैनल किसी के गुणगान कर रहा है तो कोई किसी के इससे आम आदमी भृमित हो रहा है उसे निणर्य करने में परेशानी हो रही है कि वो किस चैनल को विश्वसनीय समझें? ऐसा इसलिए हुआ है कि एक ही विषय पर कोई चैनल कुछ और परोस रहा है तो कोई कुछ जबकि सच्चाई तो शाश्वत होती है फिर ये विरोधाभास क्यों? 

इसका तात्पर्य ये है कि चैनल सच्चाई नहीं खोज कर सिर्फ अपने अपने सूत्रों के हवाले से खबरें परोस रहे है, जबकि अगर खोजी ख़बर हो तो उसमें सभी चैनल के पास सच्चाई की एक ही रिजल्ट आएगा। इससे साबित होता है कि हर चैनल अपने अपने आकाओं से फिड बैक लेकर अपनी अपनी राग अलाप रहे है। इससे मीडिया किसी एक पक्ष का होता दिखाई देता है।

लोग हमारे देश के सैकड़ों चैनलों को छोड़कर फिर से विश्वनीय खबरों व विश्लेषण के लिए बीबीसी जैसे चैनलों  की ओर वापस सुनने लगे है । क्या ये हमारे देश के चैनलों के लिए एक प्रश्नचिन्ह नही है कि सैकड़ो चैनलों को छोड़कर लोग विदेशी चैनलों की ख़बरो को सुनना पसंद कर रहा है? इस पर विचार करने की जरूरत है। 

आपसे आम नागरिक की अपील है कि आप विश्वस्तरीय विश्वसनीय मीडिया हाउस बने, हिंदुस्तान के चैनलों को पूरे विश्व मे बीबीसी की तरह विश्वसनीय माना जाए। लेकिन इसके लिए आपको निष्पक्ष रहना होगा। जनता को सच्चाई दिखानी होगी ताकि वो लोकतंत्र के लिए ऐसी सरकार चुन सके जो कल्याणकारी साबित हो और इसमें मीडिया की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। 

आपकी  अस्पष्टता जनता के मानस को बदल सकती है।क्या आपने इसे बिजनेस बना लिया है ? जबकि मीडिया तो वो कड़ी है जिससे जनता का मानस बनता बिगड़ता है ऐसे में आपकी जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है, जो सरकारों को बना सकता है और सरकारों के गिरने का कारण बन सकता है।

आप अगर निष्पक्ष नही रहेंगे और खोजी पत्रकारिता नही करेंगे तो कुछ समय के लिए तो आपसे जनता भृमित हो सकती है लेकिन धीरे धीरे जनता अपना रास्ता दूसरा चुन लेती है, जिसमे बीबीसी जैसे चैनल वापस देखे जाने शुरू हो सकते है। और अगर ऐसा होता है तो ये भारतीय मीडिया के लिए शर्मनाक स्थिति से कम नही हो सकता। 

देश की आबादी करीब 130 करोड़ के आसपास है, उसमे से चैनलों को देखने वाले लोग कितने है आप जानते है, ये जागरूक व कुछ निर्णय लेने वाले होते है और उनका निर्णय, आपके द्वारा दिखाए गए विश्लेषणों के आधार पर होता है। अगर ये लोग या इनका एक बड़ा तबका, बीबीसी जैसे चैनलों में विश्वनीयता खोजने लगा तो ये न केवल भारतीय मीडिया के लिए शर्मनाक होगा बल्कि विश्व मे भारतीय मीडिया की छवि भी खराब होगी।

अतः आपसे आम नागरिक का निवेदन है कि आप जनता को निष्पक्षता से बिना किसी लाग लपेट के सही व विश्वसनीय विश्लेषण दिखाए जिससे न केवल भारतीय मीडिया की विश्वनीयता बढे बल्कि हमारे लोकतंत्र को भी मजबूती मिले। आप खुद जानते है कि आप जनता को मूल मुद्दों से भटका कर क्या परोस रहे है? 

आरक्षण पर लोगो का मानस क्या है आपसे छुपा नही है, संसद में महत्वपूर्ण कार्य होने के बजाय शोर शराबा होता है। जबकि जनहित के बिल रुक जस्ते है और सांसदों के लाभ के बिल पास हो जाते है, हमारा मीडिया चुप रहता है,इसी तरह पब्लिक संबंधित बहस नही होकर ऐसे मुद्दों पर समय जाया किया जाता है जिनका पब्लिक का कोई भला नही होना। जिसमें श्री देवी की मौत, सलमान खान की गिरफ्तारी व जमानत की ख़बरे दिन भर चलती है। जबकि बैंक घोटाले, घोटालेबाजो का देश छोड़कर भागना,एफडीआई, जीएसटी , पेट्रोल डीजल के दाम आदि  कईं मुद्दे जनता व सरकार के बीच चर्चा के होने चाहिए, यही नहीं  इन पर पूरी खोजपूर्ण खबरें जनता के समक्ष सच्चाई से आनी चाहिए थी। जिसमे सरकार का ध्यान उन कमियों की ओर दिलाना चाहिए जिनसे ऐसे घोटाले नही हो सके।

आपसे आम नागरिक ये अपेक्षा रखता है कि आप लोकतंत्र को मजबूत रखने के लिए जनता को सही व निष्पक्ष रास्ता दिखाएंगे अगर आपकी भूमिका निस्जपक्ष नही रही तो लोकतंत्र को जो नुकसान होगा उसके लिए मीडिया  को कभी माफ नही किया जा सकेगा।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

37 साल पहले चुनाव आयोग ने किया था EVM का प्रयोग, कराना पड़ गया था बैलेट पेपर से मतदान


    
चुनाव के शोर में उस पहले चुनाव के बारे में भी जान लीजिए जो 1982 में पहली बार ईवीएम से हुआ था. उस चुनाव के दिलचस्प विवाद और नतीजे की कहानी मज़ेदार है.

हमारे देश में हर चुनाव के बाद ईवीएम की अग्निपरीक्षा शुरू हो जाती है. जीतनेवाला चुप रहता है लेकिन हारनेवाला खूब शोर मचाता है.. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदुस्तान में पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल कब हुआ और उस चुनाव का नतीजा क्या रहा?

वो साल 1982 था और प्रयोग का मैदान था केरल की परावुर विधानसभा का उपचुनाव. छोटी और शांत विधानसभा प्रयोग के लिहाज से चुनाव आयोग को ठीक लगी होगी. यहां 123 में से 50 मतदान केंद्रों पर ईवीएम का इस्तेमाल करके देखा गया.  मुकाबले में थे कांग्रेस के ए सी जोस और सीपीआई के के सिवन पिल्लई
मतदान से पहले ही सीपीआई वाले के सिवन पिल्लई ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी और ईवीएम की उपयोगिता और इस्तेमाल पर सवाल खड़े कर दिए. चुनाव आयोग अदालत में पेश हुआ. मशीन का इस्तेमाल करके दिखाया. कोर्ट ने संतुष्ट होकर मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया.

कमाल देखिए. ईवीएम पर भरोसा ना करनेवाले सीपीआई के पिल्लई साहब ने चुनाव में 2 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज कर ली.
EVM पर भरोसा ना करनेवाले सीपीआई के उम्मीदवार सिवन पिल्लई को EVM से हुए मतदान में जीत मिली थी

अब बारी कांग्रेस के ए सी जोस की थी. वो भी हाईकोर्ट जा पहुंचे. उन्होंने दलील रखी कि आरपी एक्ट 1951 और कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स 1961 ईवीएम के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देते हैं. हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के पक्ष में ही फैसला दोहराया मगर हार से दुखी जोस साहब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंचे. इस बार सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि उन 50 पोलिंग बूथ पर फिर से वोटिंग कराई जाए जहां ईवीएम का इस्तेमाल हुआ था, और वोट मशीन से नहीं बैलेट पेपर से डाले जाएं. सुप्रीम कोर्ट ने मशीन में गड़बड़ी जैसी कोई बात नहीं कही थी लेकिन ईवीएम का इस्तेमाल कानूनी होने तक रुकने पर सहमति बनी.

कांग्रेस प्रत्याशी जोस कब तक ईवीएम के समर्थक थे जब तक हार का मुंह नहीं देखा खैर फिर से मतदान हुआ. इस बार नतीजा उलट गया. 2 हज़ार से ज्यादा वोटों के अंतर से हारे जोस साहब ने 2 हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीत लिया.

देशभर के मीडिया में जमकर सुर्खियां बनीं. वो तब की बड़ी घटना थी. मशीन का पहली बार इस्तेमाल हुआ था लेकिन लौटकर बैलेट पेपर पर ही आने से ये खबर और बड़ी हो गई. कांग्रेस के प्रत्याशी ए जी जोस वैसे भी केरल विधानसभा के स्पीकर रह चुके थे. उनका कद बहुत बड़ा था. ज़ाहिर है उनकी हार से बड़ा झटका भी महसूस किया गया होगा.

इस चुनाव के डेढ़ दशक बाद तक ईवीएम का प्रयोग नहीं किया गया. 1998 वो साल था जब दिल्ली, मध्यप्रदेश और राजस्थान में विधानसभा चुनाव के दौरान 16 सीटों पर एक बार फिर प्रयोग हुआ. प्रयोग चल निकला. आखिरकार 2004 में पूरे देश ने लोकसभा चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल किया.

नितिन ठाकुर की वॉल से साभार

शनिवार, 14 नवंबर 2020

बिना पटाखों की दीपावली, घी के दिए जलाकर करें वातावरण को शुद्ध

 



अनुभूत करें भगवान राम के अयोध्या लौटने के असली दिन को


दीपावली पर पटाखें न फोड़े और दीपावली मनाएं , कितना अजीब लगता होगा ये आज से 50-60 वर्षो पहले कहना। उस समय लोग ये कहने वाले को कितना मूर्ख समझते होंगे, उसका कितना मजाक बनता होगा।


 लेकिन 2020 की 14 नवम्बर की दीपावली वास्तव में बिना पटाखों वाली दीपावली है। सरकार ने भी पटाखों को बेचने और चलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि कभी दीपावली भी बिना पटाखों के मनानी पड़ सकती है।


कोरोना वायरस ने जब मार्च में  होली पर अपनी उपस्थिति दर्ज की थी तो किसी ने सोचा नहीं था कि  ये बीमारी इतनी लंबी चलेगी और दीपावली के पटाखे चलाने की परम्परा को भी ये डस लेगी। जी हां ये डसना ही है । दीपावली का मतलब ही पटाखों का पर्याय होता है लेकिन कोरोना ने इस मतलब को बदल दिया है। हालांकि पिछले काफी वर्षो से पटाखों से  बढ़ते वायु प्रदूषण  से सरकारें  लोगों को आगाह करती आईं है और अपील करती रही है कि वे केएम से कम पटाखे जलाएं ताकि वायु प्रदूषण कम हो। दिल्ली में तो बाकायदा पटाखों का समय निर्धारित कर दिया गया कि निर्धारित समय के बाद पटाखे ऩ छोड़े जाएं लेकिन पूर्णतः प्रतिबन्ध नहीं लगाया। लेकिन इस बार तो कोरोना वायरस के कारण पटाखों पर बाकायदा पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। 


सरकारों ने पटाखें बेचने के लाइसेंस नहीं दिए है और जिनके पास स्थाई लाइसेंस थे उनके लाइसेंस भी रद्द कर दिए है। और तो और अगर आप सोच रहे है कि कोई बात नहीं बेचने पर प्रतिबन्ध लगाया है सरकार ने ,तो हमारे पास तो पहले से ही है ,एचएम उन्हें छोड़कर अपनी दीपावली पटाखों वाली मना लेंगे । तो जनाब ये भी नहीं कर सकेंगे इस बार आप। आपके पटाखे आपकी अलमारी को शोभा ही बढ़ा सकते है या फिर आप उन्हें देख कर आभास कर सकते है क्योंकि आप उन्हें छोड़ नहीं सकते। सरकार ने पटाखें बेचने के साथ साथ छोड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। 


कोरोना ने लगाई लगाम


कोरोना ने पटाखों पर लगाम लगा दी है। क्योंकि पटाखों से वातावरण में प्रदूषण बढ़ जाता है और ये प्रदूषण कोरोना मरीजों को श्वास की तकलीफ कर सकता है। इस  बीमारी में अधिकाश मौत श्वास की तकलीफ से ही होती है। मरीज के फेफड़े सामान्य श्वास भी लेने में दिक्कत महसूस करते है  और अगर फिर प्रदूषित हवा मिलने से तो जिन मरीजों की स्थिति सामान्य है उनकी पटाखों से प्रदूषित हुई हवा जान लेवा साबित हो सकती है। इसलिए सरकार ने इस बार पटाखों पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा दिया है।


घी के  दिए जलाकर मनाएं दीपावली


जब भगवान रामचन्द्र जी लंका से जीतकर अयोध्या आए थे तो लोगों ने अपने घरों पर घी के दिए जलाकर खुशियां मनाई थी। उस समय पटाखों का प्रचलन नहीं था। लोगों ने घी और तेल के दिए जलाकर इस त्यौहार को मनाने की शुरुआत की थी आज हजारों साल बाद फिर लोगों को घी और तेल के दिए जलाकर दीपावली मनानी पड़ रही है। हालांकि असली दीपावली तो घी और तेल के दिए जलाकर ही मनाई जाती है लेकिन कालांतर में इसमें पटाखों ने कब अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया पता ही नहीं चला। वर्तमान पीढ़ी तो दीपावली का मतलब ही पटाखों का त्यौहार मानती है। पटाखें नहीं जलाना मतलब अपनी खुशियों को मन मसोस कर दबाना। इसे सरकार का जबरस्ती का थोपा गया आदेश मानना। जबकि वास्तव में असली दीपावली तो घी के दीयो की ही होती है ये आज की जनरेशन जानती ही नहीं।


माटी के दीयों की सुगन्ध, घी की बाती से सरोबार होकर प्रदूषित वातावरण को शुद्ध करने को आतुर



प्रकृति ने खुद ही  भगवान राम के उस दिन अयोध्या लौटने के दिवस को एक बार फिर उसी रूप में मनाने को हमें विवस कर दिया है। देखे,महसूस करे और अनुभव प्राप्त करे, इस बार कि भगवान राम के अयोध्या लौटने के उस दीपावली के दिन भी कुछ ऐसा ही रूप था, जिसमें पटाखों की गूंज नहीं थी लेकिन घी के दीयों की वातावरण को शुद्ध करने वाली सौंधी माटी की सुंगध थीं। आज फिर हजारों वर्षो बाद उसी वातावरण को निर्मित करने का अवसर आ गया है जिसमें एक बार फिर वहीं माटी के दीयों की सुगन्ध घी की बाती से सरोबार होकर प्रदूषित वातावरण को शुद्ध करने, भगवान राम के समय के वातावरण निर्मित करने को आतुर है। उस काल में हम नहीं थे लेकिन उस काल की परिस्थितियां बनाने का एक अवसर हमें प्रकृति ने जरूर दे दिया है जिसे हमें जी कर न केवल वायु प्रदूषण को रोकना है बल्कि देश के करोड़ो लोगों को सांस की तकलीफ से भी बचाना है। अगर इस समय हमनें नहीं सोचा तो एक ही काल रात्रि में ये दीपावली का त्यौहार हजारों लाखों लोगों की जिन्दगी पर तो भारी पड़ेगा ही साथ ही उस काल के वास्तविक अनुभव से भी हमें वंचित कर देगा।


आइए हम सब मिलकर भगवान राम के उस वास्तविक दिन को अनुभूत करें जिस दिन वे अयोध्या लौटे थे और लोगों ने घी के दिए जलाकर वातावरण को शुद्ध बनाया था।


बुधवार, 21 अक्टूबर 2020

चिराग पासवान पाला बदल सकते है

 बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव की जन सभाओं में जो भीड़ उमड़ रही है वो बिहार में बदलाव की स्पष्ट कहानी कह रही है। इससे नीतीश के जेडीयू और बीजेपी में बैचैनी बढ़नी स्वाभाविक ही है।

 इस बीच रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान एल जे पी ने एन डी ए से नाता तोड लिया है ये कहकर कि मोदी से कोई बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं। अब तेजस्वी की जन सभाओं में भारी भीड़ ने उनके पिता की भविष्य दृष्टा की झलक उनमें भी दिखाई देती है।

 नीतीश का चिराग के खिलाफ जन सभाओं में जिस तरह बोला जा रहा है वो न केवल चिराग को जे डी यू से दूर कर रहा है बल्कि बीजेपी से भी उन्हें धीरे धीरे दूर करता दिखाई देता है। नीतीश की सभाओं में बीजेपी के नेता भी होते है और उनकी चुप्पी ही एक तरह से नीतीश की कहीं गई बातों में उनकी सहमति मानी जा सकती है और यही वो वजह होगी जो बिहार में चुनाव परिणामों  के बाद परिस्थितियों को बदलने वाली साबित हो सकती है।

जो चिराग अभी अपने को मोदी का हनुमान बता रहे है वे विपरीत परिणाम आते ही मौसम की तरह बदल जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कारण अगर तेजस्वी की आर जे डी और कांग्रेस को बिहार में बहुमत मिलता है तो चिराग बीजेपी नेताओं के, नीतीश की सभाओं में उपस्थित रहते हुए उनके बारे में किए गए प्रलाप को उनकी मौन स्वीकृति बताते हुए बीजेपी से किनारा करने का  बड़ा कारण बता सकते है। वे यहां तक कह सकते है कि वे तो अंत तक कहते रहे कि वे मोदी के हनुमान है लेकिन  बीजेपी ने और मोदी ने नीतीश को मेरे बारे में अनर्गल प्रलाप करने से नहीं रोका इस वजह से इस हनुमान की आस्था टूट गई और वे  इस एलाइंस से नाता तोड़ते है।

चूंकि रामविलास पासवान हमेशा, चाहे किसी की भी सत्ता रही हो वे सत्ता में रहे है इसी वजह से उन्हें  राजनीति का मौसम विज्ञानी भी कहा जाता रहा है, उसी के अनुसरण में  उनके पुत्र चिराग पासवान भी अगर तेजस्वी से हाथ मिला लें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चहिए। वे पाला बदल कर बिहार में सत्ता में आने वाली पार्टी से हाथ मिला ले तो  भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए वो चाहे फिर किसी भी दल का क्यों न हो। 

तेजस्वी ने चिराग पासवान के साथ नीतीश के बर्ताव पर बयान देकर ये संकेत भी दे दिया है कि अगर जरूरत पड़ी तो वे चिराग का साथ भी ले सकते है हालांकि उनकी जन सभाओं में उमडती भीड़  ये स्पष्ट संकेत दे रही है कि उनको शायद इसकी ज़रूरत ही न पड़े लेकिन राजनीति में रास्ते खुले रखने पड़ते है न जाने कब किसकी जरूरत पड़ जाएं।

चिराग पासवान ने भी किसी भी तरफ जाने के अपने रास्ते खुले रखे है। अगर जेडीयू और बीजेपी  एलाइंस की सरकार आती भी है तो मोदी के हनुमान को तो  तव्वजों देनी पड़ेगी और अगर नहीं आती है तो बीजेपी नेताओं का उनके बारे में नीतीश की टिप्पणी पर मौन रहना इस हनुमान का मोह भंग होने का एक कारण बनते भी देर नहीं लगेगी। और अगर आरजेडी और कांग्रेस की सरकार आती है तो तेजस्वी ने जो चिराग पासवान के प्रति सहानुभूति चुनावी सभाओं में दर्शाई है वे नजदीकियो का बड़ा कारण बन सकती है। इससे चिराग के लिए सत्ता के नजदीक रहना आसान ही रहेगा। हांलांकि ये सब उनकी पार्टी की विधानसभा में लाई गई सीटों पर निर्भर करेगा कि वे कितने पावरफुल होंगे। अपने पिता की मृत्यु की सहानुभूति उन्हें कितनी मिलती है ये भी एक फेक्टर होगा। लेकिन ये तय है कि सत्ता चाहे किसी की आए चिराग पासवान राज्य या केंद्र की सत्ता के आसपास ही रहेंगे।


रविवार, 18 अक्टूबर 2020

सिन्धु नदी समझौते पर पुनर्विचार की अटकलें

 

ये पोस्ट मेरी 4साल पहले  फेस बुक पर उस समय लिखी जिस समय मोदी सरकार पाकिस्तान का पानी रोकने की बातें कर रही थी। उस समय उरी हमले के कारण पूरे देश में आक्रोश था।


इन दिनों मीडिया में सिंधु नदी समझौते पर पुनर्विचार की चर्चाए जोरो पर है।कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी इस पर गंभीरता से विचार कर रहे है। मीडिया में बताया जा रहा है कि भारत 1960 में पाकिस्तान से हुए सिंधु समझौते को रद्द कर सकता है। जिससे पाकिस्तान का पानी बंद किया जा सकता है। पाक समर्थित आतंकियों द्वारा उरी हमले के बाद देश भक्ति का ज्जबा भारतीय जनता में कुछ ज्यादा ही है। हर कोई चाहता है कि पाकिस्तान को सबक सीखा देना चाहिए। 

ऐसे में ये समाचार आना कि सिंधु जल समझौते पर प्रधानमन्त्री मोदी  पुनर्विचार कर रहे है और पाकिस्तान को सिंधु नदी का पानी  बंद किया जा सकता है। जनता की भावनाओं का फायदा उठाकर वाह वाह मोदी , ऐसा प्रधानमंत्री पहली बार आया है जो अब पाकिस्तान को सबक सीखा सकता है, जैसे जुमले सुने जा सकते है।  मीडिया में इस तरह की वाह वाही लूटकर प्रधानमन्त्री मोदी को महिमा मंडित किया जा रहा है। 

ये ऐसी नीति है कि जिसे इस तरह प्रचारित किया जा रहा है जैसे लोग मोदी को ही नेता मानने लगे ।

 अब आपको थोड़ा सा पीछे ले चलता हूं जिसमे मीडिया में अभी कुछ दिनों पहले ही  उरी के हमलें का बदला लेने का समाचार जोर शोर से प्रचारित किया गया जिसमे पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक करने की बात जनता मीडिया के माध्यम से बताई गई। कई नेताओ व समर्थको ने तो  मोदी को 56 इंच के सीने वाला नेता बताते हुए विपक्ष को निशाना बनाया गया। 

जबकिअभी हाल ही में  सुप्रीम कोर्ट में विदेश सचिव ने बताया है कि सर्जिकल स्ट्राइक इससे पहले भी होती रही है लेकिन इस तरह उन्हें कभी प्रचारित नही किया गया। 

पाकिस्तान के साथ जिस सिंधु समझौते को रद्द करने अथवा पुनर्विचार करने की बाते की जा रही है वो भी सर्जिकल स्ट्राइक के बड़बोले पन की तरह की खबरे है जबकि हकीकत यह है कि सिंधु समझौते के तहत भारत अपने हिस्से का पूरा पानी उपयोग ही नही कर रहा। हम अपने हिस्से का पानी उपयोग करने की स्थिति में नही है इसलिए वो पानी पाकिस्तान जा रहा है। 

दरअसल उस पानी का उपयोग करने पर विचार किया जा रहा है जबकि प्रचारित यूं किया जा रहा है जैसे बस भारत पाकिस्तान का पानी रोकने ही वाला है और सिंधु नदी जल समझोते को रद्द करने वाला है। भारत की मीडिया के इस बहुप्रचारित खबरों का असर ये हुआ कि भारत ने तो पाकिस्तान का पानी बंद नही किया लेकिन चीन ने बर्ह्मपुत्र की एक सहायक नदी का पानी बंद कर दिया। 

भारतीय जनता में मोदी का प्रभुत्व जमाने के लिए प्रचारित इस समाचार का अंतराष्ट्रीय समुदाय में ये सन्देश गया कि भारत पाकिस्तान का पानी बंद करने जा रहा है । पाकिस्तान को भी भारत की इन मीडिया ख़बरों को अंतराष्ट्रीय जगत में भुनाने का मौका मिल गया और चीन ने पहला कदम उठा लिया। समझ नही आ रहा कि ये कैसी कूटनीती है जिससे लाभ तो हो न हो नुकशान पहले ही होना शुरू हो गया। 

जबकि सरकार ये जानती है कि सिंधु नदी समझौते में इतना ही किया जा सकता है कि भारत अपने हिस्से के पानी को रोक दे जिससे अंतराष्ट्रीय समझोते का उलघ्घन भी न हो और भारत की जनता की सहानुभूति भी बनी रहे। समझ से परे है कि इस तरह ढिढ़ोरा पिट कर क्यों हम अन्तराष्टिय समुदाय में अपनी विश्वनीयता में कमी ला रहे है। 

पाकिस्तान हमारे मीडिया की खबरें अंतराष्ट्रीय स्तर पर हमारे ही खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है। वो अंतराष्ट्रीय समुदाय को हमारे मीडिया की खबरे दिखाकर ये बता सकता है कि भारत में उसके खिलाफ ऐसी खबरे  दिखाई जा रही है  इन खबरों से वह अंतराष्ट्रीय समुदाय की भावनाए अपनी ओर बटोरने की कोशिश में कामयाब हो सकता है। ये कूटनीति भारतीय जनता को अपनी और आकर्षित करने के लिए तो सही हो सकती है लेकिन अंतराष्ट्रीय जगत में हमारी विश्वशनियता पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली साबित हो सकती है। जबकि मीडिया में ऐसी खबरे प्रचारित करने का एक मात्र उदेश्य जनता का रुख अपनी और करना मात्र ही  है। क्योकि मुदामुद्दी सरकार जानती है कि पानी रोकने की हद, वही तक उपयोग लाई जा सकती है 

जहा तक कि हमारें हक के पानी को पाकिस्तान जाने से रोकना । वह भी तब तक नही रोका जा सकता जब तक कि हम खुद उस पानी के उपयोग करने लायक नहरो का निर्माण नही कर लेते। क्योंकि हम पाकिस्तान को अपने हिस्से का पानी किसी सदायशता से या दयालुता से नही दे रहे , हकीकत ये है कि हमारे पास उस पानी को उपयोग में लेने लायक साधन ही उपलब्ध नही है इसलिए वो पानी पाकिस्तान जा रहा है और पाकिस्तान ने उस अतिरिक्त पानी के लिए अपनी नहरे विकसित कर ली है। 

उन नहरो में हमारे द्वारा उपयोग में नही लिए जा रहे पानी का जो हिस्सा पाकिस्तान जा रहा है उसका उपयोग 1960 से सिंधु नदी के किनारे बसे पाकिस्तानी गांव या शहर कर रहे है। जब भी  हम उस अतिरिक्त दिए जा रहे पानी को रोकोंगे तो पाकिस्तान अंतराष्ट्रीय जगत में हमारे मीडिया की इन खबरों को दिखाकर ये साबित करने की कोशिश करेगा  कि भारत ने हमारे पानी को रोक दिया है जैसे कि हमें पूर्व में ही आंशका व्यक्त की थी। भारतीय मीडिया की  ये खबरे उस समय पाकिस्तान के लिए अंतराष्ट्रीय समुदाय से सिम्पेथी प्राप्त करने का कारण बन सकती है। क्या इसे सफल दूरगामी कूटनीति कहा जा सकता है ?  इस तरह की नीति कुछ समय के लिए तो वाहवाही दिला सकती है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम हमारे लिए ही घातक सिद्ध हो सकते है। इसलिए अति उत्साह में हमें  अपनी नीतियों का खुलासा समय से पहले नही करना चाहिए। उचित समय और क्रियान्विति के बाद ही जरुरत होने पर ही खुलासा करना चाहिए।