मंगलवार, 26 मई 2020

कोरोना ने हर ली हर किसी हालत

भारत में पहला कोरोना मरीज 30 जनवरी को केरल में पहचाना गया, जो चीन के बुहान से ही अाया था
उसके  50 दिन बाद यानी 22 मार्च को जनता कर्फ्यू और 25 मार्च से 21 दिन का लाक डाउन किया गया।

30 जनवरी से 22 मार्च तक केंद्र सरकार क्या करती रही?

केरल में पहले कोरोना केस की जानकारी तो केंद्र को हो ही चुकी थी और दूसरी तरफ चीन और अन्य देशों में ये महामारी फैल ही चुकी थी।  तो फिर 50 दिनों में कोरोना से लड़ने के लिए कोई योजना केंद्र सरकार ने क्यों नहीं बनाई? ये सवाल तो जनता पूछ ही सकती है। क्या केन्द्र सरकार को इस अवधि में कोई गाइड लाईन नहीं बना लेनी चाहिए थी ? ये एक सहज ही प्रश्न उभरता है एक सामान्य आदमी के जेहन में।

अगर सरकार सतर्क होती तो इन 50 दिनों में मजदूरों और प्रवासियों  को  जो अपने  घरों को जाना चाहे उन्हें  पहुंचाया जा सकता था। लेकिन सरकार ने लगता है इस 50 दिन की अवधि को यूं ही व्यर्थ गंवाया। उसने इस महामारी को गंभीरता से लिया ही नहीं।

22 मार्च जनता कर्फ्यू लगाने तक भी शायद सरकार इस महामारी से बचने की योजना नहीं बना सकी उसके 3 दिन बाद ही पूरे देश में 21 दिन का लाक डाउन लागू कर दिया गया। यानी 22 मार्च तक भी सरकार ये तय नहीं कर पाई थी उसे कोरोना से कैसे मुकाबला करना है, अगर 22 को तय कर चुकी होती तो  लोगों को अपने अपने घरों में पहुंचने की अपील कर सकती थी, लेकिन सरकार अनिश्चय की स्थिति में थी शायद वो सोच रही थी कि स्थिति नियंत्रण में अा जाएगी, लेकिन स्थिति नियंत्रण में होती दिखाई नहीं दी तो 25 मार्च से 21 दिन का लाक डाउन लगा दिया। इसका तात्पर्य 25 मार्च को 21 दिन का लाक डाउन घोषित करने तक भी सरकार ये सोचती रही कि इन 21 दिनों में हम  इस बीमारी पर नियंत्रण कर लेंगे तब भी  उसने मजदूरों, प्रवासियों को  वहीं रुकने की अपील की अगर सरकार की सोच में आगे और लाक डाउन बढ़ाने की सोच या कोई योजना होती तो वो मजदूरों व प्रवासियों को अपने घरों तक पहुंचने का समय देती और फिर लाक डाउन की घोषणा करती।  लेकिन 25 मार्च से लाक डाउन की घोषणा करने वाली सरकार तब भी आगे के लिए अनभिज्ञ थी। यानी उसे खुद पता नहीं था कि 21 दिन बाद लाक डाउन खोलना भी पड़ेगा या बढ़ाना पड़ेगा।

खैर  जैसे ही 21 दिन पूरे होने को हुए  केंद्र  की  नरेंद्र मोदी सरकार ने  लाक डाउन अगले 19 दिन के लिए  और बढ़ा दिया । अर्थात् केंद्र सरकार 30 जनवरी से 25 मार्च तक के 50 दिनों में, 25 मार्च से 14 अप्रेल तक के 21 दिनों में भी कोरोना महामारी से देश को कैसे लड़ना है  ये तय करने की नीति नहीं बना सकी अगर बना लेती तो मजदूरों और प्रवासियों को अपने गांव पहुंचाने की कोई व्यवस्था कर देती ।

40 दिनों के लाक डाउन के बाद जनता की समझ में अा गया कि सरकार के पास कोई योजना नहीं है और न जाने ये लाक डाउन आगे कब तक चले, इसलिए साधन नहीं होने के बावजूद भी हजारों लाखों मजदूर पैदल ही  निकल पड़े, जिसमें बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं  शामिल थी  ये केंद्र सरकार के प्रति लोगों का पहला अविश्वास था। जो सरकार कि अपीलों के बाद भी अपने घरों को  साधन नहीं होने के बावजूद भी, जाने के लिए  पैदल ही निकल पड़ा था। ये भी पहली अवज्ञा थी सरकार के प्रति कि लोग सरकार के बार बार न निकलने की अपील के बावजूद भी  निकल पड़े। दूसरे लाक डाउन तक तो मजदूरों का धैर्य जवाब दे चुका था

जब तीसरा लाक डाउन 3 मई से शुरू हुआ तो उद्योग जगत को चिंता हुई कि ऐसे कैसे चलेगा उद्योगपतियों को अपने उद्योगों की चिंता सताने लगी।  3 मई तक सरकार ने भी  उद्योगों के लिए भी कोई नीति या रूपरेखा  प्रस्तुत नहीं की थी ।

हां 3 मई के बाद सरकार कहने लगी कि लाक डाउन समाप्ति के बाद उद्योग शुरू होंगे इसलिए मजदूर नहीं निकले लेकिन मजदूर तो  दूसरे लाक डाउन के शुरू होते ही निकल चुके थे और जो कुछ सरकार के प्रति आश्वस्त थे वे  तीसरे लाक डाउन की घोषणा के बाद निकल गए क्योंकि उन्हें लगा कि अब सब अनिश्चित है इसलिए अब अपने घरों को ही जाना उचित है।


54 दिनों की इस अवधि के तीसरे चरण में केंद्र  सरकार ने राज्यों से इस बाबत बात करनी शुरू की क्योंकि सरकार को लगने लगा कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है, राज्यों ने भी उद्योग शुरू करने के प्रस्ताव दिए क्योंकि दूसरे चरण की समाप्ति तक राज्यों के राजस्व का भी बुरा हाल हो रहा था, लेकिन तब तक मजदूर निकल चुके थे  और सरकारों द्वारा फैक्ट्रियां चालू करने की अपील भी मजदूरों को पलायन से नहीं रोक सकी, क्योंकि मजदूर का मन उचट गया था वो हर हाल में एक बार अपने घर पहुंचना चाहता था। इसलिए उस पर किसी भी सरकार की अपील का कोई असर नहीं हुआ और वो साधन न होने के बावजूद भी पैदल ही निकल पड़ा। ये सभी राज्य सरकारों की अवज्ञा थी। लोग मार खा खा कर भी आगे बढ़ रहे थे मानो उन्हें मौत दिखाई पड़ रही थी और वे मरना अपने गांव में ही चाहते थे।  ये एक बार फिर  कोई नीति या योजना न होने के कारण हुआ। 

पहली बात तो अगर केंद्र सरकार के पास पहले ही दिन से कोई योजना होती तो मजदूर अपने घर भी हो आते और  फैक्ट्रियों में काम भी पूरी शक्ति से शुरू हो पाता।
नीति के अभाव में 21 दिन तक तो मजदूर  पहले लाक डाउन की समाप्ति तक तो जैसे तैसे टिके रहे, हालांकि  22 मार्च के जनता कर्फ्यू के बाद 25 मार्च से लागू पहले लाक डाउन से ही अधिकांश मजदूर सड़कों पर उतर पड़े थे क्योंकि वे इस असमंजस में थे कि क्या मालूम ये लाक डाउन कब तक चले, जो बचे थे वे दूसरे लाक डाउन की घोषणा के साथ ही अपने घरों को निकल पड़े और जो रुके थे वे तीसरे लाक डाउन की घोषणा के साथ ही अनिश्चय जान पैदल ही निकल पड़े।

 ऐसी स्थिति क्यों बनती ? अगर सरकार पहले ही दिन अपनी रूपरेखा जनता के सामने रख देती इससे ये होता कि मजदूर अपने घरों को भी हो आते और चौथे लाक डाउन तक उद्योग और फैक्ट्रियां भी पूरी क्षमता से  काम शुरू कर देती क्योंकि मजदूरों की होम सिकनेश की पूर्ति भी हो जाती और वे वापस काम पर भी खुशी खुशी लौट आते।

 कोई योजना  सामने न होने से  अब एक तरफ सरकार उद्योगों  को  शुरू करना चाह रही है दूसरी तरफ मजदूर अपने घरों तक पहुंचे ही है या कुछ पहुंचे भी नहीं है रास्ते में है। इससे उद्योगों में मजदूर नहीं मिल रहे और फैक्ट्रियां पूरी क्षमता से काम शुरू नहीं कर पा रही। इससे पिछले  करीब  दो महीने से पटरी से उतरी अर्थ व्यवस्था को गति नहीं मिल पा रही। रिजर्व बैंक का कहना है कि  इस बार स्थिति माइनस में जा सकती है।

अब इसे प्राकृतिक आपदाओं में सरकार का फेलियर कहा जाएं या कुछ और। सरकारें बनाई ही इसीलिए जाती है संकट के समय जनता को कोई तकलीफ़ न होने दे लेकिन यहां तो जनता पिछले दो महीने से पिस रही है न राज्य सरकारें उनके दुख दूर कर पा रही है और न केंद्र सरकार।
 अब बेरोजगारी के कारण जो भुखमरी का दौर आने वाला है वो और भी भयावह हो सकता है। इसके लिए अभी से सरकारों को सर्वव्यापी योजना बना लेनी चाहिए।  अब मध्यम वर्ग में आत्महत्या, सामूहिक आत्महत्या जैसे केस ज्यादा अा सकते है क्योंकि ये वर्ग जो निजी क्षेत्रों में काम करता था , उनका रोजगार चला गया होगा और वे मुफ्त सरकारी योजना के दायरे में आएंगे नहीं तो उनके पास क्या रास्ता बचेगा?  ऐसेमध्यम वर्गीय लोग पिछले  दो महीनों से जो कुछ बचत थी उसे खो चुके है अब उनके मुफलिसी के दिन शुरू हो गए है, सरकार उन्हें कुछ देगी नहीं, मांगना वे चाहेंगे नहीं तो आखिर कितने दिन चलेगी उनकी गाड़ी।  अब आने वाले समय में समाचार पत्रों में ऐसी खबरें आम हो सकती है जिसमें किसी एक व्यक्ति या पूरे परिवार सहित आत्महत्या करने की खबरें हो।

शुक्रवार, 15 मई 2020

दुख हरो हे जनता! अब भी पैदल चल रहे इन लोगों का

दुख हरो हे जनता!
 अब भी पैदल चल रहे इन लोगों का


वाह रे कोरोना! इनके  दुख को 20 लाख करोड़ के पैकेज ने  दूर नहीं किया। ये अब भी पैदल चल रहे है।इनके लिए कब बसें चलेगी, न इनके पास देने को किराया है न खाने को रोटी और न पीने के लिए पानी के पैसे ही।

सरकारें तो कुछ करें या न करें कुछ लेकिन शहरों और गांवों से गुजरते इन लोगों के लिए सेवाभावी संस्थाएं तो जगह जगह इनके लिए सेवा शिविर लगा ही सकती है जैसे रामदेवरा पैदल जाते लोगों के लिए जगह जगह शिविर लगाएं जाते है निशुल्क खाना ,रहना और मालिश के लिए दर्द निवारक तेल। ताकि इनकी अपने गांव जाने की पैदल यात्रा आसान हो सकें।  मानवता की इससे बड़ी सेवा कोई हो ही नहीं सकती। सरकारों के भरोसे तो ये पलायन रुकता दिखता नहीं। गांव गांव के सेवाभावी लोगों को ही आगे आना होगा उन्हें अपने गांव की सड़कों से गुजरते ऐसे लोगों के लिए गांव के बाहर ही शिविर लगा कर इनकी सहायता करने को, ताकि ये पैदल चलते लोग वहां रुक सकें कुछ देर विश्राम कर सकें, भोजन कर सकें और जब थकान दूर हो जाएं तो वापस अपनी इस यात्रा पर आगे बढ़ सकें।

परिवारों के साथ जा रहे लोगों को एक ही टेंट में तो एकल लोगों को सोशल दिस्टेंगिंग से ठहराए। उनके गांव की सड़क पर पहुंचते ही सेनेताइज करें फिर उन्हें टेंट में भेजें उनके लिए खाने की व्यवस्था हो आराम करने लिए  बिस्तर चद्दरों सहित। जितने दिन वो रुकना चाहे रुके और जब वे चले जाएं तो उस स्थान को पहले सैनेताईज करें फिर उनके उपयोग में लिए गए बिस्तर आदि को 2-3 दिनों तक धूप में रखें फिर उनका उपयोग करें।

ये कोई मुश्किल नहीं बस इच्छाशक्ति की जरूरत है। गांव  में रहने वाले लोगों से ज्यादा तो पलायन वाले लोग नहीं है इसलिए गांव के लोग अगर चाहे तो इन पैदल चलते लोगों का दुख कुछ कम कर सकते है।

सरकारों के वश का नहीं है ये सब जनता अगर चाहे तो कर सकती है। ये पैदल चलते लोग वे है जिनके पास बसों और रेलों का किराया देने की सामर्थ्य नहीं है, अगर होती तो ये श्रमिक ट्रेनों में न अा जाते, उन स्पेशल ट्रेनों में नहीं अा जाते जिनमें राजधानी का किराया लगता है। इनकी मज़बूरी और बेबसी को समझे और अगर आपके गांव की सड़क से ऐसे लोग निकलते दिखे तो उनकी सहायता करें।
देखिए इनके पैरों की हालत नीचे के फोटो में क्या इन्हें कोई शौक है इस तरह पैदल चलने का।  कोई रास्ता नहीं दिखा तो ये चल पड़े है पैदल ही। क्या मानवता , हमारा धर्म नहीं कहता कि ऐसे लोगों की सहायता को हम आगे आएं।

ऐसे लोगों की मदद ही सच्ची सेवा है। उन गांवों के लोगों को भगवान ने सेवा का मौका दिया है जिन गांवों की सड़कों से ये लोग गुजर रहे है। इनके दिलों से निकली सच्ची दुआएं ही आपके जन्म जन्मांतर को सुखमय बना सकती है। इनकी सेवा भगवान की सेवा से भी बढ़कर होगी।

बुधवार, 13 मई 2020

ऐसे बनेगा लोकल ही वोकल

लोकल को बनाना है वोकल



प्रधानमन्त्री जी ने लोकल को वोकल बनाने की जो बात कही है उस पर लोकल लोगों को और लोकल उत्पादन करने वाले उद्योगपतियों दोनों को चिंतन करने की जरूरत है। लोकल चीज अगर अच्छी क्वालिटी की मिलेगी तो लोग उसे खरीदने में प्राथमिकता देंगे और अगर उसकी क्वालिटी घटिया होगी तो लोग दूसरी खरीदेंगे।  इसलिए लोकल को वोकल बनाने के लिए  क्वालिटी का जो ध्यान रखेगा वो अपने उत्पाद को वोकल बना सकेगा, और जो क्वालिटी का ध्यान नहीं रखेंगे उनके लिए चाहे प्रधानमन्त्री कहे या कोई भी, जनता उसे स्वीकार नहीं करेगी।
इसलिए लोकल को अगर वोकल बनाना है तो क्वालिटी का ख्याल रखना होगा। चीनी आइटम की तरह नहीं कि, सस्ती तो हो लेकिन क्वालिटी न हो। बाज़ार में लंबे समय तक टिकने के लिए जरूरी है कि आप अपनी क्वालिटी मेंटेन रखें। निश्चिंत मानिए अगर आप क्वालिटी बनाए रखेंगे तो भी आपकी लोकल होने की वजह से अन्य चीजों से आपकी दरें,बड़ी कम्पनियों से कम ही होगी। और कुछ नहीं तो जो ट्रांसपोर्टेशन का खर्चा है वो तो कम होगा ही, ऐसे में बड़ी बड़ी कम्पनियों कि क्वालिटी मेंटेन रखते हुए आप लोकल लोगों को उसी क्वालिटी की वस्तुएं सस्ती दे सकते है, और जब अच्छी क्वालिटी की कोई चीज सस्ती मिलेगी तो कोई क्यों दूसरी या विदेशी चीज खरीदेगा।

बस तय लोकल को वोकल बनाने का करना है तभी प्रधानमन्त्री की बात बनेगी अन्यथा भाषण है और भाषण तक ही रह जाएगी लोकल को वोकल बनाने की बात।

बुधवार, 4 मार्च 2015

आप पार्टी मे वर्चस्व की लडाई शुरू

आप पार्टी मे वर्चस्व की लडाई शुरू हो गई है . आप के नेता जिन्होने इस पार्टी को सींचा है वे ही अब अपना वजूद चाहने लगे है और ये सही भी है कि जब कोई पेड बडा हो जाए तो उसके फल की चाह उन सभी को होती है जिन्होने उसे लगाया है .पेड लगाने के लिए जमीन को तलाश कर उसे लगाना और फिर उसे प्रतिरोपित करना ,फिर उसकी देखभाल करने से लेकर उसमे फल लगने तक साथ रहने वाले सभी लोग उसके फल की चाह रखते है और वे समझते है कि पहला फल चखने का पहला अधिकार उनका है और ये मानवीय प्रव्रति है ,लेकिन होता क्या है कि ,पौधा लगने तक तो कुछ लोग ही होते है लेकिन जब वो पौधा अच्छा पेड बनता अन्य लोगो को दिखता है तो वे भी उस पेड को सीचने मे जुट जाते है ,कारवा थोडा ज्यादा हो जाता है लेकिन पोधे के लिए जमीन तलाशने वाले और उसे प्रस्थापित करने वाले उस पर अपना अधिक अधिकार मानते है और जब पेड पहला फल देता है तो वे उस पर पहला हक अपना मानते है जबकि बाद मे जुटने वाले भी उसी फल को पहले अपना मानते है और ऐसे शुरू होता है वर्चस्व का दौर . आप बतावे कि पहला हक किसका है ? पेड के लिए जमीन तलाश कर उसे प्रतिस्थापित कर उसे पौधा बनाने वाले लोगो का ?अथवा पौधा बनने के बाद उसे पेड बनाने मे सहयोग करने वाले लोगो का ? या सभी का बराबर अधिकार है पहला फल चखने का . आप पार्टी मे पहला फल पका हुआ दिल्ली की सत्ता रूपी बागडोर का है जिसे सभी अपना बता कर श्रेय लेना चाहते है .हालाकि धीरज रहे तो इस पेड मे कई और फल लग सकते है लेकिन पहले फल को ही पाने की लालसा ने इसा पार्टी मे ये नौबत ला दी है .अब देखना है कि कौन धीरज से संतोश से इसे खाने को राज़ी होता है और कौन उतावली मे है 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

क्यो जरूरी था भूमि अधिग्रहण बिल 2013 मे अध्यादेश के माध्यम से संशोधन ?


बीजेपी सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून 2013 मे कुछ संशोधनो की जरूरत अध्यादेश के माध्यम से दिसम्बर 2014 मे करने की क्या जल्दी थी और वह भी तब जबकि दो महिने बाद फरवरी मे तो बज़ट सत्र होने ही वाला था ,फिर क्यो अध्यादेश लाने की जल्दी थी ,बजट सत्र मे ही संशोधन बिल पेश कर, बहस के बाद इसे पारित कराया जा सकता था .बीजेपी इसका जो कारण बताती है वो एक हो सकता है कि अन्य बिलो मे इसके प्रभावी होने से संशोधन की समस्या हो जाती इसलिए कानूनी बाध्यता के चलते इसे 29 दिसम्बर को लाना पडा .हो सकता है यह अपनी जगह सही भी हो लेकिन जानकारो का मानना है कि ये अध्यादेश लाना इसलिए भी जरूरि था क्योकि 26 जनवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा भारत आ रहे थे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के कारण उनके साथा आने वाले कम्पनियो कए सी ओज को निवेश के लिये प्रोत्साहित करने के लिये उन्हे ये बताना जरूरी था कि भारत मे उनके लिये उद्योग लगाना कितना आसान है ,इस संशोधन से उन निवेशको मे ये सन्देश दिया गया कि उनके लिये �भारत मे भूमि खरीदने मे उन्हे कोई परेशानी नही होगी और वे आसानी से अपनी च्वाईस की भूमि अपनी शर्तो पर कही भी खरीद सकते है भारत का कानून कही उनके लिए बाधक नही बनेगा
इससे प्रभावित होकर ही ओबामा ने भारत के 100 शहरो को स्मार्ट सिटी बनाने का आश्वासन दे गये ,क्या आप जानते है वे 100 शहर कौनसे है ? ये सभी शहर ऐसे है जहा जमीनो की किमते आसमान छू रही है ऐसे मे समार्ट सिटी बनाने के लिए उन कम्पनियो को जमीन तो चाहिए ना ,अगर 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून लागू रहता तो इन कम्पनियो को 80% भूमि मालिको की सहमति जरूरी होती जो तभी हो पाती जबकि भूमि मालिको को उचित दाम मिलते ऐसे मे स्मार्ट सिटी बनाने वाली कम्पनियो को ज्यादा रकम भूमि मालिको को देनी पडती ,और ये भी हो सकता थ कि ये कम्पनिया अपने हाथ भी खींच लेती इससे निपटने के लिए और उनकी बाधा दूर करने के लिए ओबामा के आने से पहले ये संशोधन जरूरी हो गये थे और अध्यादेश लाने के अलावा और कोई सरल रास्ता भी नही था .उधोगो के लिये किसानो की भूमि अपनी मन चाही कीमत पर लेना तो ऐसे ही हुआ कि एक घर को बसाने के लिये बसे बसाए घर को उजाडना .हा ये सही है कि भारत मे उधोगो के लिए इंफ्रास्ट्रचर ,व सरल,आसान प्रक्रिया जरूरी है लेकिन उसके लिए भूमि मालिको, किसानो को उन उधोगो के मालिको के रहमो करम पर छोड देना तो लोकतांत्रिक मूल्यो के अनूकूल नही कहा जा सकता ,खेती को उजाड कर यदि हम ओधोगिकिकरण करना चाहते है तो क्या इसे समझ्दारी कही जा सकती है जबकि हमारा देश क्रषि प्रधान कहा जाता हो ओधोगिकीकरण भी उतना ही जरूरी है जितना कि खेती और किसानो का हित

भूमी अधिग्रहण अध्यादेश के विरोध मे अन्ना का जंतर मंतर पर धरना


भूमी अधिग्रहण कानून 2013 के कुछ प्रावधानो मे संशोधंन के लिए भाजपा सरकार द्वारा दिसम्बर 2014 मे लाए गये अध्यादेश का विरोध जहा पहले विपक्षी दल ही कर रहे थे ,अब उस अध्यादेश का विरोध करने अन्ना हज़ारे भी पहुच गए है और उनके साथ मेधा पाटकर सहित करीब 70-80 किसान संगठन बताए जा रहे है .वास्तव मे 2013 मे जो भूमी अधिग्रहण बिल संसद मे पास किया गया उसका विरोध न तो उस समय बीजेपी ने किया और न ही किसान संगठनो और अन्ना हज़ारे ने किया ,तब अचानक बीजेपी के दिसम्बर 2014 के अध्यादेश का सभी क्यो विरोध करने लगे है ऐसे क्या संशोधन अध्यादेश के माध्यम से किये गये है कि इसका विरोध शुरू हो गया है . आईये कुछ समझने की कोशिश करते है कि आखिर जो बीजेपी 2013 के बिल पर सहमत थी तो फिर ऐसी क्या मजबूरिया थी कि उसे 2014 मे सत्ता मे आते ही इस बिल मे संशोधन के लिये संसद के सत्र तक का इंतज़ार नही था और उसे अध्यादेश के माध्यम से रष्ट्रपति महोदय से हस्ताक्षर कराकर लागू करना पडा और अब 6 महिने मे अध्यादेश को संसद मे पास कराने की अनिवार्यता ने सरकार को विरोध के रूप मे देखना पड रहा है
क्यो है विरोध ?
जानकारो का मानना है कि इस अध्यादेश के माध्यम से नरेन्द्र मोदी सरकार ने जो संशोधन किए है वह किसान विरोधी है ,जिसमे यह संशोधन सबसे बडा विरोध का कारण है कि 2013 के भूमी अधिग्रहण कानून मे निजी या कारपोरेट द्वारा भूमी के अधिग्रहण से पूर्व 80% भूमी मालिको की सहमति होने पर ही भूमी का अधिग्रहण किया जा सकेगा,सरकारी मामलो मे यदि भूमी अधिग्रहण अनिवार्य होने पर 70% मालिको की सहमति जरूरी होगी ,लेकिन इस सरकार ने इस प्रावधान को समाप्त कर दिया है अर्थात अब भूमी मालिको की सहमति जरूरी नही होगी यदि किसी निजी या कारपोरेट घराने को भूमी की जरूरत होगी तो वह अपनी जरूरत के हिसाब से भूमी को अधिग्रहित करा सकेगा इसके लिए 80% भूमी मालिको की सहमति के प्रावधान को हटा दिया गया है अर्थात यदि किसी निजी या कारपोरेट घराने को अपना उद्योग स्थापित करने के लिए भूमी की जरूरत होगी तो वह भूमी अधिग्रहित करा सकेगा
दूसरा विरोध का कारण यह बताया जा रहा है कि 2013 के भूमी अधिग्रहण कानून मे किसानो को या भूमि मालिको को उनकी भूमी की किमत निजी या कारपोरेट व भूमि मालिको के बीच हुई सहमति से निर्धारित होगी लेकिन विरोध करने वालो का कहना है कि नए लाये अध्यादेश मे नरेन्द्र मोदी सरकार ने यह प्रावधान हटाकर निजी या कारपोरेट द्वारा दी गई कीमत पर ही भूमी मालिको को संतोष करना पडेगा,यदि इसमे सच्चाई है तो यह वास्तव मे विरोध का कारण है ही ये तो एक तरह से पूंजीपतियो को मनमानी करने की खुली छूट देना है जो गरीब और कमजोर किसानो व भूमि मालिको की कमर तोड देने वाला है
तीसरा विरोध इस अध्यादेश का इस कारण भी हो रहा है कि यदि कोई किसान तय किया मुआवजा लेने को राजी नही होता है तो उसका मुआवजा सरकारी कोष मे जमा कराया जा सकता है अर्थात सरकार या निजी और कारपोरेट घराना जो मुआवजा तय करता है वो ही मुआवजा भूमि मालिको को लेना पडॆगा नही तो वह सरकारी कोष मे जमा हो जाएगा और भूमी का मालिकाना हक उस सरकारी ,निजी या कारपोरेट घराने के पास चला जाएगा जिसने भूमि का अधिग्रहण किया है यदि ये सही है तो इसका सीधा सीधा अर्थ तो भूमि छिनना हुआ

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

जाम मे जकडा शहर बीकानेर्

आज राजस्थान पत्रिका मे बीकानेर की रेल फाटको की समस्या पर पूरा एक पेज स्पाट लाईट आया है ,हर कोई इसका जल्दी समाधान चाहता है ,लोग बहुत परेशान है किसी दिन शहरवासी उमड पडे तो जिला प्रशासन,रेल अधिकारियो और जन प्रतिनिधीयो को भारी पड सकती है उनकी ठिलाई ,केवल बयान बाजी से काम नही चलेगा जनता बहुत परेशान हो चुकी है सब्र का बान्ध कब टूट जाये कोई थाह नही ,लोग अन्दंर ही अन्दंर भारी परेशान है ,अगर किसी संगठन ने झंडा पकड लिया तो जनता उसके साथ हो लेगी और फिर बीकानेर मे भी 16 दिसम्बर की दिल्ली जैसे सैलाब को होते देर नही लगेगी .सब्र का प्याला छलक पडे उससे पहले ही कोई समाधान सम्बधित जिला प्रशासन,रेल प्रशासन,और जनप्रतिनिधी तलाश ले तो अच्छा है
जागो प्रशासन जागो,आश्वासनो का लालीपाप बहुत हो गया ,जनता अब राहत चहती है केवल आश्वासन नही ,आश्वासनो को झेलते हुए उसे वर्ष्रो हो चुके है और सिथति वही ठाक के तीन पात वाली बनी हुई है ,नेता प्रशासन सब लाली पाप चूसा रहे है बीकानेर की जनता को ,इसा जाम से जनता आज़ीज़ आ गई है समझ लीजिए जनता के मन की बात ,जान लीजिए उसकी परेशानी कही ऐसा ना हो कि कानून व्यवस्था की सिथति बिगडने की नौबत आ जाए ,उपर के फोटो मे कैसे रैंग रहे है लोग ,ये स्थति हर रोज़ दिन मे कई कई बार होती है आखिर इस सिथति को कब तक सहन कर सकती है जनता ,विचार किजिए प्रशासन ,रैल प्रशासन और जनप्रतिनिधीयो ,एक एक दिन भारी होने लगा है अब इस समस्या से बीकानेर की जनता का