सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

भूमी अधिग्रहण अध्यादेश के विरोध मे अन्ना का जंतर मंतर पर धरना


भूमी अधिग्रहण कानून 2013 के कुछ प्रावधानो मे संशोधंन के लिए भाजपा सरकार द्वारा दिसम्बर 2014 मे लाए गये अध्यादेश का विरोध जहा पहले विपक्षी दल ही कर रहे थे ,अब उस अध्यादेश का विरोध करने अन्ना हज़ारे भी पहुच गए है और उनके साथ मेधा पाटकर सहित करीब 70-80 किसान संगठन बताए जा रहे है .वास्तव मे 2013 मे जो भूमी अधिग्रहण बिल संसद मे पास किया गया उसका विरोध न तो उस समय बीजेपी ने किया और न ही किसान संगठनो और अन्ना हज़ारे ने किया ,तब अचानक बीजेपी के दिसम्बर 2014 के अध्यादेश का सभी क्यो विरोध करने लगे है ऐसे क्या संशोधन अध्यादेश के माध्यम से किये गये है कि इसका विरोध शुरू हो गया है . आईये कुछ समझने की कोशिश करते है कि आखिर जो बीजेपी 2013 के बिल पर सहमत थी तो फिर ऐसी क्या मजबूरिया थी कि उसे 2014 मे सत्ता मे आते ही इस बिल मे संशोधन के लिये संसद के सत्र तक का इंतज़ार नही था और उसे अध्यादेश के माध्यम से रष्ट्रपति महोदय से हस्ताक्षर कराकर लागू करना पडा और अब 6 महिने मे अध्यादेश को संसद मे पास कराने की अनिवार्यता ने सरकार को विरोध के रूप मे देखना पड रहा है
क्यो है विरोध ?
जानकारो का मानना है कि इस अध्यादेश के माध्यम से नरेन्द्र मोदी सरकार ने जो संशोधन किए है वह किसान विरोधी है ,जिसमे यह संशोधन सबसे बडा विरोध का कारण है कि 2013 के भूमी अधिग्रहण कानून मे निजी या कारपोरेट द्वारा भूमी के अधिग्रहण से पूर्व 80% भूमी मालिको की सहमति होने पर ही भूमी का अधिग्रहण किया जा सकेगा,सरकारी मामलो मे यदि भूमी अधिग्रहण अनिवार्य होने पर 70% मालिको की सहमति जरूरी होगी ,लेकिन इस सरकार ने इस प्रावधान को समाप्त कर दिया है अर्थात अब भूमी मालिको की सहमति जरूरी नही होगी यदि किसी निजी या कारपोरेट घराने को भूमी की जरूरत होगी तो वह अपनी जरूरत के हिसाब से भूमी को अधिग्रहित करा सकेगा इसके लिए 80% भूमी मालिको की सहमति के प्रावधान को हटा दिया गया है अर्थात यदि किसी निजी या कारपोरेट घराने को अपना उद्योग स्थापित करने के लिए भूमी की जरूरत होगी तो वह भूमी अधिग्रहित करा सकेगा
दूसरा विरोध का कारण यह बताया जा रहा है कि 2013 के भूमी अधिग्रहण कानून मे किसानो को या भूमि मालिको को उनकी भूमी की किमत निजी या कारपोरेट व भूमि मालिको के बीच हुई सहमति से निर्धारित होगी लेकिन विरोध करने वालो का कहना है कि नए लाये अध्यादेश मे नरेन्द्र मोदी सरकार ने यह प्रावधान हटाकर निजी या कारपोरेट द्वारा दी गई कीमत पर ही भूमी मालिको को संतोष करना पडेगा,यदि इसमे सच्चाई है तो यह वास्तव मे विरोध का कारण है ही ये तो एक तरह से पूंजीपतियो को मनमानी करने की खुली छूट देना है जो गरीब और कमजोर किसानो व भूमि मालिको की कमर तोड देने वाला है
तीसरा विरोध इस अध्यादेश का इस कारण भी हो रहा है कि यदि कोई किसान तय किया मुआवजा लेने को राजी नही होता है तो उसका मुआवजा सरकारी कोष मे जमा कराया जा सकता है अर्थात सरकार या निजी और कारपोरेट घराना जो मुआवजा तय करता है वो ही मुआवजा भूमि मालिको को लेना पडॆगा नही तो वह सरकारी कोष मे जमा हो जाएगा और भूमी का मालिकाना हक उस सरकारी ,निजी या कारपोरेट घराने के पास चला जाएगा जिसने भूमि का अधिग्रहण किया है यदि ये सही है तो इसका सीधा सीधा अर्थ तो भूमि छिनना हुआ

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

जाम मे जकडा शहर बीकानेर्

आज राजस्थान पत्रिका मे बीकानेर की रेल फाटको की समस्या पर पूरा एक पेज स्पाट लाईट आया है ,हर कोई इसका जल्दी समाधान चाहता है ,लोग बहुत परेशान है किसी दिन शहरवासी उमड पडे तो जिला प्रशासन,रेल अधिकारियो और जन प्रतिनिधीयो को भारी पड सकती है उनकी ठिलाई ,केवल बयान बाजी से काम नही चलेगा जनता बहुत परेशान हो चुकी है सब्र का बान्ध कब टूट जाये कोई थाह नही ,लोग अन्दंर ही अन्दंर भारी परेशान है ,अगर किसी संगठन ने झंडा पकड लिया तो जनता उसके साथ हो लेगी और फिर बीकानेर मे भी 16 दिसम्बर की दिल्ली जैसे सैलाब को होते देर नही लगेगी .सब्र का प्याला छलक पडे उससे पहले ही कोई समाधान सम्बधित जिला प्रशासन,रेल प्रशासन,और जनप्रतिनिधी तलाश ले तो अच्छा है
जागो प्रशासन जागो,आश्वासनो का लालीपाप बहुत हो गया ,जनता अब राहत चहती है केवल आश्वासन नही ,आश्वासनो को झेलते हुए उसे वर्ष्रो हो चुके है और सिथति वही ठाक के तीन पात वाली बनी हुई है ,नेता प्रशासन सब लाली पाप चूसा रहे है बीकानेर की जनता को ,इसा जाम से जनता आज़ीज़ आ गई है समझ लीजिए जनता के मन की बात ,जान लीजिए उसकी परेशानी कही ऐसा ना हो कि कानून व्यवस्था की सिथति बिगडने की नौबत आ जाए ,उपर के फोटो मे कैसे रैंग रहे है लोग ,ये स्थति हर रोज़ दिन मे कई कई बार होती है आखिर इस सिथति को कब तक सहन कर सकती है जनता ,विचार किजिए प्रशासन ,रैल प्रशासन और जनप्रतिनिधीयो ,एक एक दिन भारी होने लगा है अब इस समस्या से बीकानेर की जनता का



बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

रेलवे फाटको के कारण रैंगता शहर बीकानेर

रेलवे फाटको के कारण रैंगता शहर बीकानेर
राजस्थान पत्रिका के बीकानेर संसकरण मे कल ये फोटो छपी है जिसमे लोग शहर के बीचोबीच स्थित रेल फाटको से किस तरह परेशान कि घंटो परेसान होने के बाद भी फाटक नही खुलने पर मिलकर एक दुसरे की मोटर साईकिलो को फाटक के उपर से निकालने को मजबूर है ,इनको मालूम है ये खतरनाकहै और गैर कानूनी भी .लेकिन ना तो प्रशासन और ना ही रेलवे और ना ही चुने हुए जन प्रतिनिधी इसका निदान निकालने के प्रति गंभीर दिखाई देते है .ये समस्या कोई 1-2 साल की नही है बीकानेर की जनता इस समस्या से वर्षो से दो चार हो रही है ,पर सरकार, प्रशासन,जनप्रतिनिधी ऐसी कुभकर्णी नीन्द सोए है कि उनकी नीन्द है कि खुलने का नाम ही नही ले रही .किसी दिन जनता परेशान होकर सडको पर उतरेगी और इस उदाशीनता के प्रति लावा फूटॆगा तभी सभी पक्षो की आंखे खुलेगी .
ऐसे फ़ोटो कोई आज ही नही आये है अखबारो मे ये तो रोज़ आते है पर कोई फर्क नही पडता ना तो प्रशासन पर ना रेल अधिकारियो पर और ना ही जन प्रतिनिधीयो पर ,शांत शहर को अशांत क्यो बनाने को उतारू है ,ये सब ! प्लीज हमारे शांत शहर को मजबूर मत करिए,शीघ्र राहत देकर यहा को लोगो को छुटकारा दिला दिजिए ना आप सब मिलकर

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

दिल्ली के चुनावो से भाजपा और कांग्रेस दोनो बडी पार्टियो को सबक लेने की जरूरत है : जनता ने उनको चुना जिन्होने बिना किसी जातिय भेदभाव के वोट मांगे ,


दिल्ली की जनता ने पूरे देश के लोगो के मिजाज को बता दिया है कि जनता किसी भी जाति,धर्म,समुदाय को अपना वोट बैंक समझने वाली पार्टीयो को नकारने लगी है , इन चुनावो मे ना तो इमाम बुखारी की अपील को जनता ने स्वीकार किया और ना ही राम रहीम के 22 लाख अनुयायियो ने. उन्होने इन राजनीतिक दलो को ये बता दिया है कि अब उनको जाति धर्म समुदाय के आधार पर वोट मांगने की अपनी रणनीति को बदल लेना चाहिये वरना उनका हष्र आगामी चुनावो मे दिल्ली जैसा होने मे देर नही लगेगी , अब भारत की जनता, बांटने की राजनीति पर वोट देने की परम्परा को छोडने की तैयारी मे है और इसकी शुरूआत दिल्ली से हो चुकी है, अब वोट विकास के नाम पर ही मिलने की मानसिकता जोर पकडने लगी है , जो पार्टी जनता के इस मिज़ाज़ को जितना जल्दी समझ लेगी वो उतना ही जल्दी भारत के लोगो के दिलो पर राज़ करने मे सक्षम होगी.इसका उदाहरण केजरीवाल को दिल्ली की जनता द्वारा सत्ता सोपना है, जिन्होने आम जनता के दैनिक जीवन मे आने वाली कठ्नाईयो को अपना मुद्दा बनाया और जाति, धर्म और समुदाय से उपर उठकर वोट करने की अपील की उसका असर ये हुआ कि हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख,ईसाई सभी ने जात पांत से उपर उठकर उन्हे इतना वोट दिया कि भारतीय लोकत्ंत्र के इतिहास मे आज तक किसी को ऐसा बहुमत कभी नही मिला और शायद कभी किसी को मिले भी नही 70 सीटो मे से 67 सीटो पर (रूझान के अनुसार ,हो सकता है 1-2 सीटो मे फाईनल रिजल्ट तक बदलाव हो जाए,और ये भी कि संख्या ये ही रहे ) बहुमत , खुद केजरीवाल इतने अधिक बहुमत से अच्ंभित है , कारण स्पश्ट है कि पिछली बार जनता ने समझ लिया कि केजरीवाल काम करके दिखाने वाले नेता है लेकिन स्पष्ट बहुमत नही मिलने के कारण वे काम नही कर सके ,इस बार जनता ने इस काम करने वाले व्यक्ति पर विश्वास किया है और इनकी झोली इतनी लबालब कर दी है कि अब ये जनता को नही कह सकते कि स्पष्ट बहुमत नही मिलने के कारण हमारी पार्टी अपने वादे पूरे नही कर सकती , अब बारी केजरीवाल की है कि वो जनता की झोली मे अपने किये वादो से भरते है या नही , यदि उन्होने भी भाजपा की तरह इन वादो को चुनावी जुमला कहकर भुलने की कोशिश की तो जनता उनका भी हष्र , केन्द्र की 9 महिने पुरानी सरकार का किया है , वो दोहराने मे समय नही लगाएगी.अब जनता ने ये मिथक तोड दिया कि वोट जांत पांत ,धर्म या समुदायो के मठाधीशो से अपील कराने से मिल सकते है ,जनता जागरूक हो रही है और नेताओ की लफ्फाजियो को समझने लगी है ,उन्हे तो जो काम करता हुआ दिखाई देगा वोट उसे ही मिलेगा,इस रास्ते को अखित्यार करने लग गई है , इसलिए सभी राजनीतिक दलो को समझ लेना चाहिए कि आने वाले चुनावो मे वो लोगो की तक्लीफो पर अपने एजेन्दे बनाए और जाति ,धर्म के नाम पर वोट बटोरने की राजनीति को तिलांजली दे, जो रजनीतिक दल जनता के इस मिज़ाज़ को जितना जल्दी पकडेगा वो उतना ही जल्दी भारतीय राजनीति को अपने पक्ष मे करने मे सफल रहेगा ,साथ ही एक बात और कि लफ्फाजी का जुमला जनता को कुछ दिनो तक तो लुभा सकता है लेकिन उसे उतरते भी ज्यादा समय नही लगता ,जो इसे समझ लेगा वो सफल हो जायेगा और जो नही समझेगा वो पिछड जायेगा

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

ये कैसा जैहाद है जो मासूमो की जान लेता है


पाकिस्तान मे 142 मासूम स्कूली बच्चो की गोली मारकर तालीबानी आंतक कारियो ने हत्या कर दी , जैहाद के नाम पर, बदले की आग मे मासूमो की हत्या कौनसा धर्म देता है ये समझ से परे है , कौनसी कुरान मे लिखा है कि मासूमो की हत्या कर कोई पवित्र जंग लडी जा सकती है , कुरान तो किसी बेकसूर की हत्या को गुनाह मानता है जिससे ऐसा गुनाह करने वालो को जहन्नुम भी नसीब नही होता , कितना दर्दनाक लगता है सुनकर कि परीक्षा दे रहे बच्चो को तालीबानी आंतकियो ने गोलियो से भून दिया , उन आंतकियो के हाथ नही कापे मासूमो को मारते समय, क्या उनको ये ख्याल नही आया कि उनके भी बच्चे है , उन मा बापो का खयाल नही आया जो अपने जिगर के टुकडो को एक अच्छा नागरिक बनाने के लिए तालिम देने के लिए भेजे थे ,
अगर ये जैहाद है तो धिक्कार है ऐसे जैहाद पर , शर्म आनी चाहिए ऐसे धर्म पर जो मासूमो की जान लेता है जिनका कोई कसूर भी नही था , क्या बिगाडा था इन मासूमो ने इन आंतकियो का , अगर बदला ही लेना था तो उन लोगो से लेते जिन्होने कुछ बिगाडा था , आंतकियो के आकाओ देख लेना चहिए कि कितनी माताए , और पिता अपने लाडलो को , उन ताबूतो मे सुला रहे थे जो उनके लिए उन्होने बना दिए थे ,अगर इन्ही ताबूतो मे उन आकाओ के जिगर के टुकडे होते तो खुद उन पर क्या बीत रही होती ,क्या उनका कलेजा ये सब देख कर भी नही पसीजा कि उनकी इस करतूत को अल्लाह भी कभी माफ नही करेगा और उन्हे दोजख भी नसीब नही होगा , मासूम फूल जैसे बच्चे कफन मे लिपटे जैसे कह रहे हो ए आतंक के आकाओ हमने आपका क्या बिगाडा था जो आपने हमे खिलने से पहले ही मिट्टी मे मिला दिया
इस्लाम मे अगर जैहाद बेकसूर लोगो को ही मारकर लडा जाता है तो लानत है ऐसे जैहाद पर , ये मासूम कफन मे लिपटे बच्चे जैसे कह रहे हो कि ए आतंक के आकाओ बताओ तो जरा कि कुरान की किस आयतो मे लिखा है कि बेकसूर मासूम लोगो की जान लेकर जन्नत नसीब होती है , मोहम्मद साहब ने तो ये कहा है कि जो लोग बेकसूरो का कत्ले आम करते है उनको कोई बक्शीश नसीब नही होती , इन मासूमो की बद दुआए, इन बच्चो के अम्मी अब्बूओ की ताउम्र निकलने वाली आहे इन आतंक के आकाओ को सकून से नही जीने देगी , इन आतंक के आकाओ को ताउम्र इतनी जिल्लत जीने को मजबूर होना पडॆगा कि वे बाकी की जिन्दगी कितनी शकुन से गुजारना चाहे , कितने ही अपने गुनाहो को माफ करने के लिए प्रयशिचत करे लेकिन उनके इस गुनाह की सजा तो उन्हे जहन्नुम मे भी भुगतनी ही पडॆगी क्योकि उन्होने ऐसे मासूमो की जान ली है जिनका कोई गुनाह नही था वे बेकसूर थे और अपनी तालीम ले रहे थे

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

इन बुजुर्ग को अपनो की तलाश है , क्या आप इन्हे अपनो से मिलाने का कोइ सार्थक प्रयास करेंगे ताकि ये अपनो से मिल सके


नाम -भरत बिस्बास   उम्र 50-55 साल
पता   गांव - बून्दी पाडा,  जिला -24 परगना  राज्य-  पस्चिम बंगाल  का बताते है
भाइ का नाम- काली बदन बिस्बास बताते है ,जो सरकारी शिक्षक है
वर्तमान मे ये बुजुर्ग 
अपना घर व्र्धाश्रम , व्रन्दावन एंक्लेव ,जयपुर रोड, बीकानेर राजस्थान 
संस्था का  फोन  नम्बर, 0151-2526333  09414147142
मे पिछले सवा महिने से है , इस संथा को ये भरतपुर मे मिले थे , ये अपने घर जाने को एक एक दिन गिन गिन कर निकाल रहे है , आपका एक क्लिक इनको अपनो से मिलवा सकता है , हो सकता है कि आपके किसी दोस्त के माध्यम से ये खबर  इनके परिजनो तक पहुंच जाए और इनके परिजन इनको अपने घर ले जाए , जो इनको तलाश करते करते थक हार गए हो इसे इतना अधिक शेयर करे कि 24 घंटो मे इनके परिजनो को इनकी सूचना मिल जाए और बिछडे हुए ये बुजुर्ग जल्दी से जल्दी अपनो के बीच हो, वो मिलन कितना सुखद होगा जब बिछडॆ हुए मिलेंगे . आज मुझे इस संस्था मे जाने का अवसर मिला ये बुजुर्ग अपने घर जाने को बेताब लगे इन्होने मुझे कहा कि आप यहा के इंचार्ज को कहे कि कल मुझे ये मेरे घर भेज दे इनकी घर जाने की बेताबी और उनके आगर्ह  ने मुझे झकझोर दिया , हालांकि संस्था द्वारा भी इन्हे परिजनो से मिलाने का  प्रयास किया जाना बताया गया  लेकिन सवा महिने के समय ने इन बुजुर्ग को बहुत ही थका दिया है ये जल्दी से जल्दी अपने घर जाना चाहते है , अगर हमारे प्रयासो से ये शिघ्र अपनो से मिल पाते है तो इससे सुखद  क्या हो सकता है मेरा सम्पर्क

09414425812

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

शिक्षक दिवस पर राजस्थान राज्य के दो मंत्रियो और एक आइ ए एस अधिकारी ने किया शिक्षको को अपमानित

शिक्षक दिवस पर जिस तरह राजस्थान राज्य के दो मंत्रियो और एक आइ ए एस अधिकारी ने शिक्षको को अपमानित किया वह बहुत ही दुखद है .राज्य के शिक्षको का आत्म सम्मान बढाने के बजाय, उनके आत्म सम्मान को चोट पहुचाइ , मौका था शिक्षक दिवस पर राज्य स्तरीय सम्मान समारोह का , जहा कि वे राज्य के उत्तम शिक्षको को सम्मानित कर रहे थे. राज्य के शिक्षा मंत्री श्री काली चरण सरार्फ ने इस अवसर पर कहा कि प्रदेश मे पढ्कर कोइ टापर नही बन सकता ,तो क्या माननीय शिक्षा मंत्री जी ये बताएगे कि बोर्ड और विश्वविधालयो मे हर साल जो टाप 10 और 100 की लिस्ट निकाली जाती है वो क्या राज्य के बाहर की होती है या फिर ये लिस्टे सही नही है ?क्योकि मंत्री जी के अनुसार तो प्रदेश मे पढ्कर कोइ टापर बन ही नही सकता . शायद माननीय मंत्री जी ये भूल गये कि राजस्थान के युवाओ की जितनी डिमांड देश विदेश मे है उतनी किसी भी प्रदेश के योग्य युवाओ की नही है ,राज्य के युवा ही देश की कइ बडी प्रतियोगी परीक्षाओ मे अपना परचम फहरा चुके है और तो और राज्य के कोटा मे तो पूरे देश के युवा अपना भविस्य बनाने राज्य के शिक्षको के पास ही आते है , इन कोचिग संसथानो प्रदेश मे पढ्आने वाले राजस्थान के शिक्षक ही है जिनकी धाक पूरे देश मे है , सिविल सेवाओ ,राज्य की प्रशासनिक सेवाओ,सीए,सी एस, आइ आइ टी, आइ आइ एम जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओ मे राजस्थान के शिक्षको द्वारा पधाए गये छात्र परचम फहरा रहे है,क्या ये राज्य के शिक्षको का योगदान नही है? वे क्या विदेशो से पढ्कर आते है ? होना तो ये चाहिए था कि माननीय शिक्षामंत्री जी इन शिक्षको का मान बधाते हुए उन शिक्षको को इनसे प्रेरणा लेने की नसीहत देते जो शिक्षक अपने कर्तव्यो का पालन जिम्मेदारी से नही करते, उन्होने तो पूरे शिक्षक वर्ग को ही ये कहकर लाछिंत कर दिया कि "प्रदेश मे पढ्कर कोइ टापर नही बन सकता", ये तो सम्मान के बहाने बुलाकर अपमानित करने वाली बात हो गइ, इससे शिक्षक वर्ग का आहत होना स्वाभाविक ही है,एक बात और अपरोक्ष रूप से माननीय शिक्षा मंत्री महोदय ने अपनी योग्यता पर भी स्वय ही प्रश्न चिन्ह लगा लिया, कोइ उनसे पूछे कि माननीय जी जब आप ये समझते है कि प्रदेश मे पढ्कर कोइ टापर बन ही नही सकता
तो फिर आप तो इस शिक्षॅण व्यवस्था के मुखिया है ,जब आप ही ये सोचते है तो इसके लिए जिम्मेदार भी तो आप ही हुए ना ? फिर क्यो आप इस पद को धारण किए है ?आपको तो नैतिकता के आधार पर तुरंत पद्त्याग देना चाहिए
बात यही तक होती तो और बात थी इसी समारोह मे माननीय पंचायत राज मंत्री श्री गुलाब चन्द कटारिया ने तो शिक्षको द्वारा अंतिम संस्कार तक का खर्चा भी स्कूल के खाते से निकालने का आरोप लगाकर शिक्षको प्रति अपनी गलत मानसिकता का उदाहरण पेश कर दिया जबकि आश्चर्य तो इस बात का है कि वे स्वय शिक्षक रह चुके है .क्या माननीय कटारिया जी ये बताएगे कि एक शिक्षक को वेतन के अलावा किस मद से पैसा उथाने का अधिकार है ? ऐसा लगता कि जैसे दोनो ही माननीय मंत्री जी ये तय करके आये थे कि उन्हे शिक्षक सम्मान समारोह मे शिक्षको को सम्मानित करने की बज़ाय अपमानित ही करना है होना तो यह चाहिए था कि सम्मानित होने वाले शिक्षको के किए कार्यो का उल्लेख करते हुए पूरे शिक्षक वर्ग को इनसे प्रेरणा लेने की बाते कही जाती ताकि अन्य शिक्षॅको को भी इनसे प्रेरणा मिले लेकिन हुआ इसके विपरित
जब मंत्रियो को शिक्षको के प्रति ये उद्गार व्यक्त करते देखा तो राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव श्याम एस अग्रवाल फिर क्यो पीछे रहते उन्होने तो इन दोनो मंत्रियो को भी पीछे छोडते हुए यहा तक कह दिया कि "राजस्थानियो मे योग्यता ही नही है, मै उन्हे साथ ही नही रखता " लगता है अग्रवाल साहब राजस्थान के नही है और उनकी राजस्थानियो के प्रति कैसी मानसिकता है ये भी सबके सामने आ गया . अब तो ये भी जांच का विशय हो गया है कि उनके अधीन जितने भी लोग है वे कहा से ताल्लुक रखते है, उनके मातहतो मे कितने राजस्थान के बाहर के है , तथा उनके द्वारा लिये जाने वाले निर्णयो मे किन किन लोगो की महत्वपूर्ण भूमिका होती है कही उनकी कथनी सही तो नही है वे झूथ तो नही बोल रहे या वास्तव मे उनकी कथनी और करनी मे बहुत अंतर होता है ? जिस राज्य की जनता के चुने हुए जंप्रतिनिधियो ने उन्हे इस पद पर सुशोभित किया उन्हे राजस्थानियो मे कोइ योग्यता ही नही दिखाइ देती, यही नही इसीलिए वे राजस्थानियो को अपने साथ ही नही रखते , अतिरिक्त मुख्य सचिव साहब शायद ये नही जानते कि राजस्थानियो ने तो पूरे देश मे ही नही विश्व मे अपनी पहचान बना रखी है , अपने सामान्य घ्यान को थोडा बेहतर कर लीजिए , पूरे देश से यदि राजस्थानियो को निकाल दिया जाए तो देश की अर्थ्व्यवस्था ही डावाडोल हो जायेगी एसे कुशाग्र है हमारे प्रदेश के लोग ,इसलिए क्रिपया इन राजनेताओ के सुर मे तो सुर मत मिलाइए , प्रदेश के लोगो को इतना तो मत अयोग्य बताइए कि उनके आत्म सम्मान को आघात लगे अपने पद की गरिमा को इतना मत गिराइये कि प्रदेश की जनता को एसा न लगे कि हमारे प्रदेश के दूसरे बडे मुख्य अधिकारी की नज़र मे राजस्थानियो की क्या हैसियत है मंत्री गण तो केवल शिक्षको को ही कोस रहे थे आपने तो पूरे प्रदेश वासियो की योग्यता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया . आज पूरे शिक्षॅक वर्ग मे और प्रदेश वासियो मे रोष व्याप्त है जिसे कोइ क्षमा याचना भी दूर नही कर सक्ती