रविवार, 18 जुलाई 2021

पेट्रोल डीजल में केंद्र और राज्य दोनों कमा रहे

 


पेट्रोल और डीजल के दामों ने आम आदमी को परेशान कर रखा है। इनकी कीमतें बढ़ने से हर चीजों के दाम बढ़ते है क्योंकि  वस्तुओं का एक जगह से दूसरी जगह  रेलों ट्रकों और मालवाहक जहाजों, वायुयान आदि से परिवहन होता है। इनकी कीमतें बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ती है तो वस्तुओं के दाम बढ़ने स्वाभाविक ही है।

जनता परेशान है लेकिन केंद्र की सरकार और राज्य सरकारें दोनो ही  एक दूसरे पर आरोप लगा कर जनता को गुमराह कर रही है। केंद्र का कहना है कि राज्य सरकारें अपना वेट कम करके जनता को पेट्रोल और डीजल सस्ता दे सकती है जबकि राज्य सरकारें कहती है कि केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी कम करके जनता को राहत दे सकती है।

आप जानते है दोनो ही सरकारें एक दूसरे पर दोषारोपण कर जनता से कमाई कर रही है। सरकारें समझती है कि जनता को किस तरह गुमराह कर राजस्व वसूला जा सकता है।

पेट्रोल की वास्तविक कीमत है 33.45 रुपए प्रति लीटर

क्या आप जानते है वास्तव में पेट्रोल डीजल की कितनी है? पेट्रोल की वास्तविक कीमत 33 रुपए 45 पैसे प्रति लीटर है जी हां सिर्फ 33 रुपए 45 पैसे । इस पर केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी के नाम पर 120 फीसदी  वसूल रही है यानी तेल की वास्तविक कीमत से भी ज्यादा और ये राशि है 40 रुपए 13 पैसे जबकि तेल की कीमत ही 33 रूपे 45 पैसे है। जो सरकार  किसी चीज की वास्तविक कीमत से भी ज्यादा उसका टैक्स वसूले क्या वो लोकतांत्रिक सरकार होती है या फिर व्यापारिक मानसिकता वाली सरकार। जिस सरकार को देश की जनता ने  अपनी भलाई के लिए चुना वही सरकार जनता का शोषण करने लगे तो उसे लोकतांत्रिक सरकार कहलाने का अधिकार है और भी ऐसे समय जब कोरोना के कारण लोगों की आमदनी कम हो गई है ,लोगो के रोजगार छीन गए है, उनकी जमा पूंजी खत्म हो गई है ऐसे में जनता को राहत देने की बजाय उसका शोषण तो कोई  व्यापारी मानसिकता वाली सरकार ही कर सकती है। जिस तरह एक व्यापारी का उद्देश्य लाभ कमाना होता है उसे किसी से कोई लेना देना नही होता सिर्फ उसे अपने लाभ से मतलब होता है। आज केंद्र और राज्य सरकारें घड़ियाली आंसू तो बहा रही है लेकिन अपने खजाने को भरने से नहीं चूक रही।

राज्य सरकारें भी राजस्व की फसल काटने में पीछे नहीं

राज्य सरकारें भी कम नही है। वे अपनी राज्य की जनता को ये कहकर गुमराह कर रही है कि केंद्र ने पेट्रोल डीजल महंगा कर दिया लेकिन वे ये सत्य नहीं बता रही कि केंद्र की आड़ में वे भी  वेट के रूप में  फसल काट रही है और आरोप केंद्र पर थोप रही है। अलग अलग राज्यों में अलग अलग वेट राशि है हम यहां राजस्थान का उदाहरण पेश कर रहे है। इस उदाहरण से मेरा उद्देश्य राज्यों की मुनाफा वसूली की मानसिकता की ओर आपका ध्यान खींचना है जिसमे कोई राज्य सरकार पीछे नही है। हां कुछ राज्य सरकारें कम वेट वसुल रही है तो कुछ ज्यादा लेकिन जनता का शोषण करने में कोई राज्य सरकार भी कम नही है।

राजस्थान सरकार वेट के नाम पर पेट्रोल की वास्तविक कीमत का 93 फीसदी वसूल रही है। यानी पेट्रोल की कीमत है 35 रुपए 45 पैसे प्रति लीटर तो राजस्थान सरकार उस पर वेट ले रही  है 31 रुपए 10 पैसे प्रति लीटर। इस तरह राज्य सरकारें भी इस बहती गंगा में हाथ धोने में पीछे नहीं है और जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें नहीं है वहां की सरकारें केंद्र की बीजेपी की सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रही है। लेकिन ये आंकड़े बताते है कि हुजूर आप भी केंद्र से कम नही है जनता का शोषण करने में।

इसके अलावा पेट्रोल पंप डिलरो को मूल कीमत  35.45 का करीब 10 फीसदी कमीशन (वास्तविक 9.93%) यानि  3.32 रूपे । रोड सेस के नाम पर भी 1.75 रूपे प्रति लीटर लिए जा  रहे है, जो पेट्रोल की मूल कीमत का 5.23% है। ये रोड सेस भी केंद्र और राज्य दोनो सरकारों को मिलता है अगर इसे दोनो सरकारों के राजस्व में जोड़ा जाए तो ये केंद्र और राज्य दोनो की राजस्व वसूली में बढ़ोतरी ही करता है। यही नहीं परिवहन के नाम पर  उपभोक्ताओं से अलग अलग राशि भी अलग से वसूली जाती है जो दूरी के अनुसार कम या ज्यादा हो सकती है। राजस्थान के बीकानेर में ये 1.25 रुपए प्रति लीटर है जो मूल पेट्रोल की कीमत का 3.74% है। इस तरह इस शहर में पेट्रोल की कीमत 111 रुपए प्रति लीटर है। आपके शहर और राज्य में वेट और परिवहन की राशि कम ज्यादा होने पर पेट्रोल की कीमत कम ज्यादा हो सकती है। अगर आप अन्य राज्य से है तो अपने राज्य में इन पर लगने वाले वेट और परिवहन चार्ज की राशि के अनुसार इनकी कीमत जान सकते है। लेकिन एक्साइज,  रोड सेस, डीलर कमीशन में कोई अंतर नही है ये सभी जगह समान है।

लोकतांत्रिक सरकारें इस तरह दे सकती है जनता को राहत

एक तरफ तो सरकारें मुफाखोरी करने वालों के खिलाफ कार्यवाही कर जनता को ये संदेश देती है कि वो जनता हितैषी है दूसरी तरफ ये ही सरकारें मुनाफाखोरियों को ही मात दे रही है।  केंद्र  पेट्रोल की मूल कीमत की 120 फीसदी एक्साइज ड्यूटी लेकर और राज्य सरकारें 93 फीसदी वेट ( ये अलग अलग राज्यों में अलग अलग हो सकता है  ये राजस्थान के संदर्भ में है।) वसूल कर मुनाफाखोरियो को भी पीछे छोड़ रही है। डिलरो को कमीशन 10 फीसदी और खुद सरकारों का कमीशन 223 फीसदी( जिसमें 120 फीसदी केंद्र और 93 फीसदी राज्य के शामिल है) ये शोषण नहीं तो क्या है? फिर साहूकारी व्यवस्था और लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्या फर्क रहा?  सरकारें ही जब अपनी जनता से  200-200 फीसदी से ज्यादा टैक्स वसूलेगी तो फिर व्यापारी और साहूकार को क्या दोष देना।

अगर वास्तव में लोकतांत्रिक सरकारें जनता को राहत देना चाहती है, महंगाई पर अंकुश लगाना चाहती है तो उन्हें अपनी मुनाफाखोरी कम करनी होगी। एक वाजिब स्थिति तक ही राजस्व वसूली करनी होगी।आश्चर्य की बात देखिए कि आयकर में भी अधिकतम 30 फीसदी कर वसूलने की व्यवस्था है लेकिन पेट्रोल डीजल में मामले में तो सरकारों ने आयकर व्यवस्था को भी पीछे छोड़ दिया है। वे 120 फीसदी और 93 फीसदी टैक्स जनता से वसूल रही है। केंद्र और राज्य सरकारों को एक सीमा तक टैक्स लेना चाहिए ताकि जनता को महंगाई से बचाया जा सकें। केंद्र और राज्य सरकारें अगर 15 फीसदी तक ही राजस्व पेट्रोल डीजल से वसूली का करने का लक्ष्य निर्धारित करें तो आम जनता को बहुत ही सस्ते ये दोनो चीजे मिल सकती है ये ही नही इससे महंगाई पर भी लगाम लग सकती है।


वर्तमान कीमतों पर 50 रूपे लीटर मिल सकता है पेट्रोल

आइए देखते है कि अगर केंद्र और राज्य सरकारें अपना राजस्व आय का लक्ष्य इन दोनों चीजों से 15% निर्धारित कर दे तो जनता को वर्तमान में कितने में मिल सके है।

 पेट्रोल का उदाहरण लेते है

पेट्रोल की मूल कीमत 33.45 रुपए

एक्साइज15%           5.00

वेट15%                     5.00

डीलर कमीशन            3.32

रोड सेस                     1.75

परिवहन                     1.25

कुल                           49.77

यानि केंद्र और राज्य चाहे तो देश की जनता को 50 रुपए लीटर पेट्रोल डीजल उपलब्ध करा सकती है यानि वर्तमान  पेट्रोल डीजल की कीमतें आधी से भी कम  की जा सकती है। अगर अंतराष्ट्रीय कीमतों से भी इसे जोड़ा जाए तो भी मूल कीमतें बढ़ने पर ही कीमतें बढ़ सकती हैं और कम होने पर इससे भी कम दामों पर जनता को पेट्रोल डीजल मिल सकते है। इससे महंगाई पर भी लगाम लगाई जा सकती है, रेल बस और हवाई यात्राओं के किराए कम हो सकते है इससे जनता को बड़ी राहत  मिल सकती है।

लेकिन केंद्र और राज्य की दोनों ही सरकारें एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर राजस्व वसूली पर ही ध्यान दे रही है जनता के दुख दर्द को दूर करने की दोनों की ही मानसिकता नहीं है । जनता को इसे समझना होगा और मांग करनी होगी कि सरकारें खुद मुनाफाखौरी नहीं कर एक निश्चित प्रतिशत तक ही इन दोनो चीजों पर एक्साइज और वेट  वसूली निर्धारित करें और फिर जनता को ज्ञान दे कि अंतराष्ट्रीय बाजार की कीमतों के अनुसार इनके दाम घट बढ़ रहे है। वर्तमान में ये जनता को मूर्ख बना रहे है कि अंतराष्ट्रीय बाजार की वजह से इनके दाम बढ़ रहे है। जागरूक जनता को होना पड़ेगा तभी सरकारों की आंखे खुलेगी अन्यथा शोषण पहले साहूकार करते थे और अब सरकारें कर रही है। कोई फर्क नही है इस मामले में।

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

राजनीति की शुचिता को बरबाद कर रहे है राजनीतिक दल

 


राजनीति की शुचिता है कि सभी राजनीतिक दल, सभी धर्म सम्प्रदाय के लोगो से समान व्यवहार करें तथा सभी  को साथ लेकर चले। लेकिन देश की राजनीति अब शुचिता वाली नही रही है। सभी राजनीतिक दल अपने अपने वोट बैंक को बढ़ाने के चक्कर मे राजनीति शुचिता को भुला बैठे है। सबको साथ लेने की बजाय हर राजनीतिक दल किसी धर्म जाती विशेष का नुमाइंदा बनकर इन दिनों सामने आने लगा है।


पहले राजनीतिक दल हर धर्म और सम्प्रदाय के धर्मगुरुओं से मिलकर, उनसे उनके धर्म और सम्प्रदाय विकास  के लिए क्या किया जा सकता है उसका फीड बैक लिया करते थे ताकि उनका भी विकास हो सके।


 वर्तमान में अधिकांश राजनीतिक दल किसी विशेष धर्म और जातियों से जुड़े दिखाई देते है,जिससे न केवल देश का साम्प्रदायिक सद्भाव छिन्न भिन्न हो रहा है बल्कि धर्म और जातियों में वैमनस्यता भी बढ़ती जा रही है। राजनीतिक पार्टियों में भाजपा जहां हिंदुओं की पार्टी होने का ठप्पा अपने पर लगा चुकी है तो कांग्रेस को मुसलमानों का विशेष ख्याल रखने वाली पार्टी माना जाने लगा है। वहीं कुछ क्षेत्रीय पार्टियों ने एक अलग ही रास्ता चुना लिया है उन्होंने अपने अपने क्षेत्र के हिसाब से जातियों का चयन कर लिया है जहां वे उन जातियों के लोगों को उस जाति के  खैर ख्वाह वाली पार्टी बताते नही अघाती। उत्तर प्रदेश में यादवों को ,मुलायम अखिलेश की पार्टी अपनी पार्टी लगती है तो अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगो को बहन मायावती की पार्टी अपनी लगती है। बहुजन समाज पार्टी को तो पूरे देश के अनुसूचित जाति और जनजाति का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी माना जाने लगा है। यही नही राजनीति करने वाले लोगो ने राजनीतिक शुचिता को इतना तहस नहस किया है कि वे अपने राजनीतिक फायदे के लिए देश के लोगो को क्षेत्रीयता में बांटने में भी कोई कोर कसर नही छोड़ी। महाराष्ट्र में शिव सेना ने मराठों को उनका खेर ख्वाह बताते हुए तो असम में असम गण परिषद ने असमियों को अपना बताया। इसी तरह अलग अलग राज्यों में क्षेत्रवाद व जातिवादी आधार पर राजनीतिक पार्टियों का गठन कर राजनीतिक शुचिता को तार तार किया गया। 


जबकि राजनीतिक शुचिता को बनाए रखने के लिए ये जरूरी है कि सभी राजनीतिक दल जनता के सामने ये तस्वीर पेश करे कि वे किसी विशेष जाति धर्म, सम्प्रदाय के प्रति नही, सभी लोगो के विकास के लिए देश की बागडोर संभालना चाहते है। देश की जनता को भी ऐसे जातियों,धर्मो और सम्प्रदायों की तरफ झुकी पार्टियों को नकारना चाहिए। जाति धर्म और सम्प्रदाय से पहले देश को रखना होगा, जब देश का विकास होगा तो सभी जातियां,सभी धर्म और सभी सम्प्रदाय स्वतः ही विकास करेंगे। और अगर जनता को लगे कि कोई राजनीतिक दल किसी जाति विशेष,धर्म विशेष या सम्प्रदाय विशेष के प्रति ही समर्पित है और दूसरे धर्म या जाति के प्रति उदासीन है तो उसे एकमत से नकार दिया जाना चाहिए। अब तो जनता के पास "नोटा" जैसा ऐसा बटन भी है जिसे दबाकर वो सभी पार्टियों को सबक सिखा सकती है। हां इतना जरूर हैं कि जो राजनीतिक पार्टी जिस धर्म जाति का पक्ष लेगी उस धर्म व जाति के वोट उसे मिलेंगे लेकिन अगर अन्य सभी जातियों और धर्मो के लोग एकमत होकर ऐसी पार्टी के खिलाफ नोटा का प्रयोग करेंगे तो ऐसी पार्टियों को सबक मिल जाएगा और फिर भविष्य में ऐसे राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति को बदलने को मजबूर होना पड़ेगा। आपको याद होगा उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने एससी एसटी वोटों के खातिर एक बार नारा दिया था  " तिलक ,तराजू और तलवार,इनको मारो जूते चार" ।  लेकिन इस नारे से वे इस एससी,एसटी वर्ग की चहेती तो बन गई लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ आ गया कि इससे सत्ता के गलियारे तक नही पहुँचा जा सकता और जब दूसरी बार चुनाव हुए तो उन्होंने ब्राह्मण,बनियों और राजपूतों को बड़ी संख्या में अपनी पार्टी का टिकट देकर पिछली गलती का प्रायश्चित किया। 


राजनीतिक शुचिता को बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों को, जनता एकमत होकर मजबूर कर सकती है। आवश्यकता है तो केवल जनता की इच्छा शक्ति की है। अगर ऐसा हो जाए तो कोई  भी राजनैतिक दल,किसी जाति,धर्म या सम्प्रदाय का खेर ख्वाह होने का दावा करने से बचेगा। राजनीतिक दल भी राजनीतिक शुचिता के लिए न केवल जाति,धर्म और सम्प्रदाय विशेष का होने या प्रचारित होने का दावा करने से बचे बल्कि वे सभी वर्गों के लिए समान भाव से कार्य करने की शपथ ले। तभी ये देश जातिगत, धार्मिक  तथा साम्प्रदायिक रूप से  एक हो सकेगा और सभी के हित सध सकेंगे।

मंगलवार, 11 मई 2021

व्यंग देश में किसी चीज की कमी नहीं है

 वाह मेरी सरकार आप नहीं गुनाहगार

जी हां देश में कोरोना की दूसरी लहर आते आते इससे लड़ने की हमनें पूरी तैयारी कर ली है। अरे साहब आप हंस रहे है?  हमारी सरकार कह रही है न देश में आक्सीजन की कमी है न अस्पतालों में बिस्तरों और वेंटीलेटर की। हमने चुना है न सरकार को तो हमें तो विश्वास करना चाहिए चाहे लोग बिना आक्सीजन के मरते आपको दिखे, चाहे लोग अस्पतालों में बेड के लिए इधर से उधर दौड़ते दिखे और चाहे अस्पतालों में वेंटीलेटर भी न हो। अरे आप तो नीरे भोले है, ये सब अफवाहें तो विपक्ष फैला रहा है, ये जो सड़को पर आक्सीजन सिलेंडर लेने को लंबी लंबी कतारें देख रहे हो ना  लोगों की गिड़गिड़ाते हुए देख रहे हों न, ये सब विपक्ष के लोग है जो हमारी चुनी हुई सरकार को बदनाम करने की साजिश है, देश की छवि दुनिया में खराब करने की चाल है।

आप किसी भी अस्पताल में चलें जाइए आपको तुरंत बेड मिल जाएगा आक्सीजन सिलेंडर तो आपको अस्पताल के दरवाजे पर ही मिलेगा अगर आपको आक्सीजन की कमी है तो सेचुरेशन नापने के साथ ही आपको जरूरत की आक्सीजन मिल जाएगी। वेंटीलेटर तो खाली पड़े है जनाब आपके लिए। ऐसी व्यवस्थाएं है हमारी चुनी हुई सरकार की।

वेक्सिनेशन सेंटर तो खाली पड़े है जनाब, टीके की कोई कमी नहीं है आप तो सेंटर पर जाए और तुरंत लगा कर आ जाए। किसी भी आयु वर्ग के हो आप आपके लिए टीको की कोई कमी नही है अगर कमी होती तो हम 93 देशों को 6.5 करोड़ टीके निर्यात करते क्या जनाब? आखिर हमारी चुनी हुई सरकार है ऐसी मूर्खता कैसे कर सकती है? ये तो विपक्ष है जो सरकार की अच्छी व्यवस्थाओं को पचा नहीं पा रहा है और अफवाहें फैला रहा है।


आम आदमी से अपील है कि वो अफवाहों पर ध्यान नहीं दे। कोरोना की दूसरी लहर से मुकाबला करने को देश पहले से ही तैयार था और तीसरी लहर की भी व्यवस्थाएं हमारी सरकार ने कर ली हैं।  और हां कोरोना से मौतें भी विपक्ष बढ़ा चढ़ा कर बता रहा है, गंगा में जो लाशें बहकर आ रही है वे भी विपक्ष के लोग बहा रहे है, वे लोगों को कह रहे है अधजली लाशें बहा दो या सीधे ही प्रवाहित कर दो मोक्ष मिलेगा बस इसलिए लोग ऐसा कर रहे है। बाकी विपक्ष सरकार को बदनाम करने की साजिश कर रहा है संकट की इस घड़ी में उसे सरकार की व्यवस्थाओं की तारीफ करनी चाहिए ताकि जनता का मनोबल बढ़े और वो इस महामारी का मरते हुए मुकाबला कर सकें।

ऐसी निपट सरकार देखी है आपने कि जो अव्यवस्थाओं की बात करें उसे ही जेल भेज दे बजाय व्यवस्थाओं को सुधारने के?  बिहार की सरकार ने पप्पू यादव को इसलिए गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उन्होंने रूड़ी के यहां खड़ी  एंबुलेंस की स्थिति बता दी थी और अब ये भी लिख लीजिए कि अब जब इस पर बवाल हो गया है तो उनकी गिरफ्तारी इसके लिए नहीं किसी और केस में होना बता दी जाएगी। एक बेटा अपनी मां को आक्सजीन नहीं मिलने पर अपना दुख सार्वजनिक रूप से क्या बोला उसे गिरफ्तार कर लिया गया आखिर सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि ऐसे लोकतंत्र जिंदा नही रह सकता  लोगों को बोलने से रोकना उचित नहीं है।


इस सरकार की निरकुंशता  देखिए कि वो देश की सर्वोच्च अदालत को ही हड़का दे। कार्यपालिका के कामों में दखल न दे अदालतें।  यानि कोर्ट को  देश की स्थिति को देखते हुए स्वत संज्ञान लेने की जरूरत नहीं, लोग मरते दिखे, कहराते दिखे तो वो न्याय पालिका है जिसकी आंखों पर पट्टी बंधी है उसे तो वो पट्टी हटानी ही नहीं है। उसे तो कोई उसके पास आए तो संविधान की सीमाओं तक ही रहने देना है ।  और हमारी सरकार ने  ये व्यवस्थाएं पहले से ही कर रखी है कि कोई प्रशांत भूषण बनकर आएगा ही नही। आएगा तो भी ईडी, इनकम टैक्स, एनएसए, सीबीआई ऐसी है कि वो उससे ही पूछ लेगी कि बता सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की फीस देने का पैसा कहां से आया?  मनी लांड्रिंग का केस तैयार हो जाएगा।

ऐसी संवेदनहीन सरकार जिसे लोगो की तकलीफ दिखाई नहीं देती लेकिन जो इस सरकार को दिखाना भी चाहे तो उस पर अफवाह फैलाने का आरोप। ये कैसी सरकार चुन ली हमने? संवेदनशील सरकार तो जहां कमी दिखाई जाए उसकी पूर्ति करती दिखाई देनी चाहिए उसके बदले जो दिखाए उसे ही हड़काए। लोकतांत्रिक सरकारें तो ऐसी नहीं सुनी थी इससे पहले।


शनिवार, 8 मई 2021

हमें अपने स्वास्थ्य सिस्टम को अपडेट करना होगा

 

प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में आक्सीजन  कांस्ट्रेटर तो सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों  पर आक्सीजन प्लांट हो


गांवों में बढ़ रहे कोरोना मरीज


हमारे देश का स्वास्थ्य सिस्टम 1957 के विकसित सिस्टम पर चल रहा है। 64 साल पहले विकसित सिस्टम वर्तमान कोरोना महामारी के आगे फेल हो गया है। विशेषकर कोरोना की दूसरी लहर ने हमें ये संदेश दे दिया है कि अब हमें इस पुराने सिस्टम को अपडेट करना होगा वरना तीसरी कोरोना लहर इससे भी ज्यादा घातक सिद्ध हो सकती है। अगर हम अभी भी नहीं चेते तो भावी संकट इससे भी बड़ा होते हमें अपनी आंखों से देखना पड़ सकता है। जो राज्य सरकारें इससे सबक लेकर अपने राज्यों के हेल्थ सिस्टम को अपडेट कर लेगी वे राज्य अपनी जनता को कम से कम नुकसान  से बाहर निकाल सकेंगे।


क्या अपडेट करें कि जनहानि कम से कम हो

अब प्रश्न आता है कि हम क्या अपडेट करें कि हम भावी जन हानि से लोगों को बचा सकें। आइए विचार करते है।


प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मजबूत हों


हमारे गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप स्वास्थ्य केंद्र खुले है लेकिन उनमें या तो डाक्टर नही है या फिर वे ए एन एम के भरोसे चल रहे है। वर्तमान कोरोना संकट में इन स्वास्थ्य केन्द्रों को मजबूत किए जाने की जरूरत है ताकि वहां प्रारंभिक कोरोना मरीजों का इलाज हो सकें। वहां स्वीकृत पदों के अनुसार चिकित्सक, पैरा मेडिकल स्टॉफ हो उसके बाद प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर कोरोना के कम गंभीर मरीजों के इलाज की व्यवस्था हो, वहां कोरोना जांच की मशीन तकनीकी कर्मचारी के साथ हो।


 इसके अलावा जो आक्सीजन कांस्ट्रेटर जिला अस्पतालों में दिए जा रहे है वे प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर उपलब्ध हो। ये आक्सीजन कांस्ट्रेटर 5 लीटर आक्सीजन प्रति मिनिट मरीज को दे सकते है। गांवों में जिन कोरोना मरीजों को 5 लीटर आक्सीजन प्रति मिनिट की जरूरत हो उन्हें वहीं आक्सीजन मिल जाएं तो सामुदायिक केंद्रों तथा जिला अस्पतालों में ऐसे मरीजों का आना कम हो जाएगा जिससे बड़े अस्पतालों पर भार कम होगा और वे गंभीर कोरोना मरीजों का इलाज कर सकेंगे।


वर्तमान में हो ये रहा है कि जो भी आक्सीजन कांस्ट्रेटर आ रहे है वे सभी बड़ी अस्पतालों में आ रहे है इसलिए वहां भीड़ लगी है कम गंभीर मरीज भी वहीं पहुंच रहे है तो गंभीर मरीज भी।वहां के डाक्टरों को तो दोनो तरह के मरीजों को देखना पड़ रहा है जिससे क्रिटिकल मरीजों की जान समय पर इलाज नहीं मिलने से जा रही है। मेरा मानना है कि हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर कम से कम 5 आक्सीजन कांस्ट्रेटर तो उपलब्ध तो हो और इनकी व्यवस्था एक बार क्षेत्रीय विधायक के विधायक कोटे की राशि से की जाएं। इस तरह कम गंभीर कोरोना मरीजों का इलाज अपने गांव के पास स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर मिल सकेगा और बड़े अस्पतालों में गंभीर मरीज ही पहुंचेंगे जिससे डाक्टरों को उनका इलाज करने का समय मिल सकेगा।


सामुदायिक स्वास्थ केंद्रों पर हो आक्सीजन प्लांट


इसी  तरह हर सामुदायिक केंद्र पर एक आक्सीजन प्लांट  लगाया जाएं ताकि आक्सीजन कांस्ट्रेटर से ज्यादा आक्सीजन जरूरत वाले कोरोना मरीजों का इलाज सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर हो सकें। हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर कम से कम 10 बेड  वेंटीलेटर  वाले हो साथ ही 10 आक्सीजन कांस्ट्रेटर भी हो ताकि लिक्विड आक्सीजन वाले मरीजों के स्वास्थ्य में सुधार होने पर उन्हें आक्सीजन कांस्ट्रेटर पर लिया जा सकें।


इन सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर आक्सीजन प्लांट, वेंटीलेटर तथा आक्सीजन कांस्ट्रेटर  तथा आक्सीजन सिलेंडरों की व्यवस्था भी विधायक कोटे, नगर पालिका ,नगर परिषद या ग्राम पंचायतों के ग्रामीण विकास के बजट से की जाएं इसके अलावा स्थानीय भामाशाहों के सहयोग से भी इसके लिए आर्थिक सहयोग लिया जा सकता है। इससे ऐसे कोरोना मरीज जिन्हे ज्यादा आक्सीजन तथा वेंटीलेटर की जरूरत है वे अपने नजदीक के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर अपना इलाज करा सकें। इससे केवल क्रिटिकल मरीज ही जिला अस्तपतालों में पहुंच पाएंगे। और जिला अस्पतालों पर बहुत ही कम भार हो जाएगा और वे अच्छे तरीके से क्रिटिकल मरीजों की देखभाल कर सकेंगे।


 इसके अलावा ज्यादातर सामुदायिक केंद्रों में भी डाक्टरों तथा पैरा मेडिकल स्टाफ, वेंटीलेटर आपरेट करने वाले तकनीकी कर्मचारी, फार्मासिस्ट , रेडियो ग्राफर आदि की कमी है। हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर एक्सरे मशीन, रेडियोलॉजिस्ट,सोनोग्राफी मशीन, लेबोरेट्री, लेब असिस्टेंट, स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ, सर्जन, मेडिसिन, दंत चिकित्सक, एंबुलेस तथा इनसे संबंधित हर उपकरण व जांच की सुविधा उपलब्ध हो।


जिला अस्पतालों में क्रिटिकल मरीजों की देखभाल हो


जिले के बड़े अस्पताल में केवल क्रिटिकल मरीज ही पहुंचे शहरी क्षेत्र के प्राथमिक तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर उनकी आवश्यकता के अनुसार वहीं व्यवस्थाएं हो जो ग्रामीण क्षेत्र के प्राथमिक, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर जो सुविधाएं हो वे हो लेकिन इनमें आक्सीजन वाले बिस्तरों की संख्या वहां की आबादी घनत्व को देखते हुए कम ज्यादा रखी जा सकती है।


बड़े अस्पताल में आई सी यू, क्रिटिकल केयर की जरूरत वाले मरीजों के साथ साथ कम गंभीर मरीजों के इलाज की व्यवस्था भी हो ताकि क्रिटिकल केयर से निकले मरीजों को उनकी जरूरत के हिसाब से शिफ्ट किया जा सकें। जिला अस्पतालों में अक्सीजन प्लांट की क्षमता जरूरत को ध्यान में रखते हुए रखी जाएं ताकि आक्सिजन की कमी नही रहें। इनके लिए फंड की व्यवस्था स्थानीय विधायक सांसद, नगर निगम, नगर विकास न्यास, जिला परिषद, सी एस आर कंपनियों तथा बैंकों, भामाशाहों आदि से की जा सकती है।


कोरोना महामारी की रफ्तार को देखते हुए मनरेगा के कामों में अस्थाई रूप से अस्पतालों में उपकरण खरीदने,  अस्पताल भवन बनाने आदि की मंजूरी भी बिना देरी के दे देनी चाहिए ताकि स्वास्थ्य सेवाएं अपडेट होकर इस महामारी से मुकाबला करने को तैयार हो जाएं।


डाक्टरों तथा पैरा मेडिकल स्टॉफ की नियुक्ति राज्य सरकार करें। मुसीबत काल में सेवा निवृत डाक्टरों तथा पैरा मेडिकल स्टॉफ की सेवाएं भी ली जा सकती है। सरकार योग्य चिकित्सको तथा पैरा मेडिकल स्टॉफ का चयन कर उनका पैनल भी तैयार कर सकती है जिन्हे जरूरत पड़ने पर बुलाया जा सकता है।


आवश्यकता इस वैश्विक महामारी से दिमाग से तथा व्यवस्थित रूप से लड़ने की है। इससे ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को भी सीधे शहरों में दौड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि अगर अच्छा इलाज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मिलेगा तो मरीज अपने आप ही अपने नजदीक के स्वास्थ्य केंद्र पर पहुंचेंगे। लेकिन होता क्या है कि हमारी आधी अधूरी व्यवस्थाएं लोगों में विश्वास नहीं जमा पाती। वर्तमान स्थिति क्या है कि जहां एक्सरे मशीन है वहां रेडियोलॉजिस्ट का पद ही नहीं है। न वहां मशीन खराब होने पर उसे ठीक करने वाला तकनीशियन। लेबोरेट्री तो है लेकिन लेब टेक्नीशियन का पद खाली पड़ा है या जांच की सामग्री की कमी है। इन्ही कमियों की वजह से ग्रामीण सीधे जिला मुख्यालय या बड़े अस्पताल जाना पसंद करते है हमारी सरकारों को ऐसी कमियों को दूर करना होगा तभी जनता का विश्वास  ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों पर जमेगा।

बुधवार, 5 मई 2021

हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर आक्सीजन प्लांट क्यों नहीं

कोरोना की तीसरी लहर की क्या तैयारियां कर रहे हम

जब हमें ये पता है कि कोरोना की तीसरी लहर भी आएगी तो हमारी सरकारें हर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर  इससे मुकाबला करने के लिए चिकित्सकों, पैरा मेडिकल स्टॉफ,आक्सीजन प्लांट, कम से कम 10 वेंटीलेटर बेड, उन्हें संचालित करने वाले स्टॉफ की व्यवस्था क्यों नहीं कर रही।


अगर हमें अपनी पब्लिक की जान बचानी है तो ये व्यवस्थाएं करनी ही होगी अन्यथा हालात दूसरी लहर से भी ज्यादा खराब हो सकते है।


आक्सीजन का एक प्लांट ,  वेंटीलेटर तथा उसके बेड आदि का पैसा उस क्षेत्र के विधायक को अपनी विधायक कोष की राशि से अपने क्षेत्र के हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए देना चाहिए ताकि उनके क्षेत्र के हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में आक्सीजन की कमी, वेंटीलेटर तथा बेड की कमी न रहे। 


 एक विधायक  को एक वर्ष में  काफी राशि विधायक कोष में मिलती है और उसके क्षेत्र में इतने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी नही होते की इन सब पर वो राशि खर्च हो जाए। और अगर हो भी जाए तो ये जरूरी भी है और अभी अति जरूरत वाली भी।


इसी तरह राज्य सरकारों को इन सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर पर्याप्त चिकित्सकों, पैरा मेडिकल स्टॉफ को तथा वेंटीलेटर तथा आक्सीजन प्लांट को संचालित करने वाले तकनीकी स्टॉफ को लगाने की व्यवस्था करनी चाहिए। राज्य सरकार अगर स्थाई स्टॉफ नहीं रख सकती तो कम से कम संविदा वाले ऐसे कर्मियों का पैनल तैयार कर तो रख ही सकती है ताकि एमरजेंसी में इनकी सेवाएं ली जा सकें।


अगर हमने अब भी तैयारियां  नहीं रखी तो फिर लोगो की जान खतरे में पड़ सकती है। अभी समय इस महामारी पर ध्यान केंद्रित करने का है चुनावों या अन्य धार्मिक आयोजनों का नहीं। केंद्र और राज्य सरकारों को भावी खतरे को देखते हुए अब तो कम से कम तैयारियां कर ही लेनी चाहिए। विडम्बना ये है कि हमारी सरकारें एक व्यवस्था करती है तो उससे संबंधित अन्य व्यवस्थाएं नहीं करती जिससे उस व्यवस्था का पूरा लाभ जनता को नहीं मिल पाता।


अभी हाल ही में कई अस्पतालों में वेंटीलेटर खुले ही नही क्योंकि इनके संचालन वाले या इंस्टाल करने वाले लगाए ही नहीं गए जिससे वेंटीलेटर होते हुए भी मरीजों को इनका लाभ नही मिल पाया। इसी  तरह निशुल्क दवा वितरण की व्यवस्था तो कर दी गई, दवाइयां भी पहुंचा दी गई लेकिन इन्हे वितरित करने वाले  फार्मासिस्ट लगाए ही नही गए जिससे अप्रशिक्षित नर्सिंग स्टॉफ से इनका वितरण कराया जा रहा है। अब जिस नर्सिंग स्टाफ को मरीजों को ड्रिप, इंजेक्शन पट्टी आदि के काम करने चाहिए वे अपना मूल कार्य छोड़कर गांवों  की अस्पतालों में निशुल्क दवा वितरित कर रहे है।  अब कोई तो काम सफर हो ही रहा है। 


यही नहीं जिन अस्पतालों में एक्स रे मशीन, सोनोग्राफी मशीन या अन्य जांच मशीनें है,  उनके खराब होने पर उन्हें ठीक करने वाले तकनीकी मेकेनिक ही नहीं है जिससे एक बार खराब होने पर वे मशीनें कई कई  दिनों तक ठीक नही हो पाती । इनको ठीक करने कंपनी के मेकेनिक जब आते है तब तक मरीज परेशान होते  रहते है। अगर जिला स्तर पर इन मशीनों को ठीक करने वाले तकनीकी मेकेनिको के पद स्वीकृत कर दिए जाए तो वे पूरे जिले में कहीं भी ऐसी  मशीन खराब होने पर बिना कंपनी के मेकेनिकों का इंतजार किए जल्दी दुरस्त कर सकते  है।


जरूरत इस बात की है कि किसी भी सुविधा के शुरू करने से पहले उसके सभी पहलुओं की भी व्यवस्थाएं की जाएं ताकि वे चुस्त दुरस्त रहे और हर समय अपनी पूरी क्षमता से कार्य करती रहें।

सोमवार, 3 मई 2021

सेवा निवृत डॉक्टर, नर्स और सेना की मदद क्यों नहीं ?

देरी से किए निर्णयों से हजारों लाखों लोग जिंदगी से हाथ धो बैठेंगे

देश में इस समय कोरोना की दूसरी लहर ने कहर बरपा रखा है, आक्सीजन, दवाइयां तथा अस्पतालों में बेड की कमी से लोगों की सांसे उखड़ रही है। ऐसे में लगता है देश में कोई सरकार नहीं है । न राज्यों की सरकारें और न केंद्र सरकार ही कोई निर्णय ले पा रही है।

हालात साफ बता रहे है कि देश में हेल्थ इमरजेंसी है ऐसे में सरकारों को बिना देरी किए कई निर्णय लेने चाहिए जैसे केंद्र सरकार कह रही है कि आक्सीजन की कोई कमी नहीं है तो फिर वो सेना के माध्यम से कमी वाले राज्यों, जिलों में आक्सीजन क्यों नही पहुंचा रही ? क्या वो देश को बड़ी भारी क्षति होने के बाद जागेगी? कमी नहीं है तो फिर आक्सीजन तुरंत पहुंचे ऐसी व्यवस्था क्यों नही कर पा रही? क्या ये राजनीति करने का समय है? 

दूसरी तरफ अस्पतालों में तीमारदारों की कमी है कोविड वार्डों में  एक दो डॉक्टर और पैरा मेडिकल स्टाफ के भरोसे सैकड़ों मरीजों को छोड़ा जा रहा है क्या वे क्रिटिकल मरीजों के बेड तक समय पर पहुंच सकते है? 

 ये भी शिकायते लगातार आ रही है कि मरीजों की उठने के ताकत नहीं है कि वे उठकर पानी भी पी सके  खाना और दवाइयां खुद से लेना कैसे संभव हो सकता है? और ये भी संभव नही है कि वार्ड में ड्यूटी पर लगे एक दो रेजिडेंट डॉक्टर और दो तीन पैरा मेडिकल स्टॉफ हर मरीज की इन आवश्यकताओं को पूरा कर सकें आखिर वे भी तो इंसान है। 

तो इसके लिए विकल्प क्या हो सकते है?

कई विकल्प है इसके लिए

केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के लिए एमरजेंसी बजट जारी करना चाहिए जिसमें राज्य सरकारें अपनी जरूरत के हिसाब से  तथा कमी वाले कोवीड वार्डो में रिटायर्ड डॉक्टर, और पैरा मेडिकल स्टाफ को लगा सकें इसके अलावा ऐसा संभव नही हो तो जो छात्र एम बी बी एस के अंतिम वर्ष में है उनकी सेवाएं ली जा सकती है इसके अलावा नर्सिंग कर रहे पैरा मेडिकल छात्रों को भी पूरी सुरक्षा देते हुए लगाया जा सकता है।

अगर ये भी संभव न हो तो सेना के जवानों की  सेवाएं मरीजों की देखभाल के लिए ली जा सकती है चार पांच मरीजों की देखभाल के लिए एक जवान को  लगाया जा सकता है जो मरीजों को समय पर दवा, पानी खाना दे सकें। हमारे जवान अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से निभाएंगे। 

इलाज के लिए सेना के रिटायर्ड डॉक्टर और पैरा मेडिकल स्टाफ की सेवाएं ली जा सकती है। वे पूरी जिम्मेदारी से इस संकंट की घड़ी में लोगों की जान बचाएंगे।

मरीजों को लाने ले जाने के लिए सेना की गाड़ियां काम में ली जा सकती है। नए कोविड वार्ड सेना के इंजीनियर आनन फानन में खड़े कर सकते है।

आवश्यकता है निर्णय लेने की

इस समय की देरी हजारों लाखों लोगों की जान ले सकती है। जो निर्णय केंद्र सरकार को लेने है बिना देरी किए तुरंत इंप्लीमेंट करने चाहिए और जो निर्णय राज्य सरकारों को लेने है वे राज्यों को लेने चाहिए ताकि लोगों की जान बचाई जा सकें। हमारे देश में दानदाताओ की कमी भी नहीं है वे न राज्य सरकार को धन की कमी आने देंगे और न केंद्र सरकार को। जरूरत केवल पवित्र मन से बिना राजनीति किए काम करने की है। पवित्र भावना से किए जाने वाले कार्यों में धन की कमी कभी नही आ सकती।


शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

काला बाजारियों जरा सोचो

संकट की इस घड़ी में जब लोग मानव सेवा निशुल्क कर रहे है तब तुम लोगों को लूट रहे हो ? 


निशुल्क सेवा नहीं कर सकते तो  कम से कम कालाबाजारी तो मत करो


इतना तो कर ही सकते हो कि जितने कीमत की वस्तु दवा या आक्सीजन है उस कीमत पर तो दे सकते हो ये भी बहुत बड़ी सेवा होगी इस संकट काल में। इस कीमत में भी आपका मुनाफा तो शामिल ही है।


अस्पतालों में क्या हालत हो रही है ये तुम भी देख रहे होंगे  किसी का जवान बेटा दवाइयों आक्सीजन के अभाव में दम तोड रहा है तो किसी का सुहाग लुट रहा है कोई बच्चे अपने पिता माता को खो रहे है तो कोई बहन अपने भाई के लिए हाथ पैर जोड़ रही है।


एक बार अपने को उस बेड पर होने की कल्पना करो और सोचो कि आपकी मां आपके जीवन के लिए भीख मांग रही है आपकी पत्नी डाक्टरों से आपको बचाने की गुहार लगा रही है आपके बेटे बेटी कातर निगाह से बेबस खड़े है आपकी बहन आपकी जान बचाने के लिए लोगों के पैर पड़ रही है और आपके लिए न रेडमेसीवर मिल रही है न  आक्सीजन। 


आप अभी कालाबाजारी करके लाखों कमा भी लेते है लेकिन हो सकता है आप भी इस बीमारी की चपेट में आ जाओ । अगर आप रेडमेसिवर बेचते हो तो मान लिया आप रेडमेसिवर की व्यवस्था तो कर लोगे लेकिन आक्सीजन की जरूरत होने पर आपके परिजन उसी तरह गुहार लगाते दिखेंगे जिस तरह दूसरे लोग अभी कर रहे है और उनको भी आक्सीजन नही मिलेगी तो क्या होगा। इसी तरह जो लोग आक्सीजन की काला बाजारी कर रहे है वे अपने और परिजनों के लिए आक्सीजन की व्यवस्था तो कर लेंगे लेकिन रेडमेसिवर के लिए तो उन्हे भी किसी के हाथ पांव पकड़ने होंगे । बताए इस तरह काला बाजारी कर लाखों कमाए किस काम के? 


इसी तरह उन जरूरी चीजों की काला बाजारी कर लाखों कमाने  वाले अपने को उस बेड पर होने की कल्पना करें जिस पर मौत मंडरा रही है उस समय घर के लोगों को किस चीज की जरूरत नहीं होगी आप जिस वस्तु का व्यापार करते है मान लिया उसकी व्यवस्था तो आप बेड पर से कर देंगे लेकिन वहां पर दवाइयां आक्सीजन के लिए तो आपके परिजनों को भी उसी लाइन में लगना पड़ सकता है। ऐसे में वो लाखों कमाए हुए ऐसे ही खर्च हो जाएंगे।


अगर काला बाजारी न हो तो क्या हो


अगर काला बाजारी न हो तो  देश में आक्सीजन जरूरत से ज्यादा उपलब्ध है। अगर कालाबाजारी न हो तो रेडमेसिवर सबको मिल सकती है। अगर काला बाजारी न हो तो किसी वस्तु की देश में कमी नहीं है। और कमी भी है तो कालाबाजारी की वजह से ज्यादा लोग जान गंवा रहे है आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है लेकिन कालाबाजारी की  पूर्ति नहीं हो सकती। 


कई लोग और संस्थाएं इस संकट की घड़ी में  लोगों को फ्री भोजन, आक्सीजन, दवाइयां आदि दे रहे है क्या आप अपने पास के स्टॉक को अपना वाजिब मुनाफा रखते हुए  भी नही दे सकते? ये भी तो बड़ी सेवा है कि आपके पास उपलब्ध स्टॉक तक आप उसे उतनी कीमत पर उपलब्ध कराए जितने की वो है। स्टॉक समाप्त तो आप क्या कर सकते है। अगर सभी ये संकल्प ले ले तो कोई मां अपने बेटे के लिए गिड़गिड़ाती नहीं दिखेगी कोई पत्नी अपने सुहाग की भीख मांगती नहीं दिखेगी कोई बहन अपने भाई के लिए किसी के पैरो में गिरती नहीं दिखेगी कोई बच्चे अपने माता पिता के लिए बिलखते नहीं दिखेंगे।


 बस  इतना भर करना है कि आप जिस किसी का भी व्यापार करते है उस चीज को उतने ही दामों में बेचने का संकल्प ले कि इस महामारी में मुझे काला बाजारी नहीं करनी। मैं आपको मुफ्त में बेचने को नही कहता क्योंकि मैं जानता हूं घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या? लेकिन आप इतना तो इस महामारी के वक्त कर ही सकते है। ये भी आपका योगदान ही होगा। और अगर सभी ये निश्चय कर ले कि मैं इतना सहयोग तो करूंगा ही तो देखिए फिर हमारे लोगों की जान कैसे बचनी शुरू हो सकती है।


शमशानो में जिन्हे जलाया जा रहा है या जिन्हे कब्रिस्तानों में दफनाया जा रहा है उनमें से किसी के साथ भी कमाया हुआ एक पैसा भी नहीं जा रहा फिर इस संकट की घड़ी में  कमा किसके लिए रहे हो? कहीं काला बाजारी से संकट की इस घड़ी में कमाया गया पैसा आपके किसी परिजन की बीमारी पर ही खर्च न हो जाएं?  ये गारंटी तो है नहीं कि ये बीमारी आपको या आपके परिजन पर तो आएगी ही नहीं। 10 दिनों में ये बीमारी अच्छे भले इंसान को लील सकती है तो हमारा जीवन भी तो अनिश्चित है फिर ऐसी कमाई किस काम की?


कोई नहीं देख रहा लेकिन वो ऊपर वाला तो देख रहा है


हां सही है कि आपको काला बाजारी करते हुए कोई नहीं देख रहा लेकिन वो ऊपर वाला तो सबको देख रहा है।  किसी का जवान बेटा जा रहा है तो किसी का भाई! ये इस जन्म का नहीं तो प्रारब्ध का कोई कर्म तो है ही जो उन्हे ऐसा देखना पड़ रहा है।  मान लो इस जन्म में  काला बाजारी से धन कमा लिया और कुछ हुआ भी नहीं तो आप लोगों को तड़पते देख तो रहे है वो उनके इस जन्म का नहीं तो प्रारब्ध का तो कोई कलंक तो है ही।


इसलिए इस संकट की घड़ी में काला बाजारी नही कर मानव सेवा करो। अगर नहीं कर सकते तो कम से कम आम दिनों की तरह अपना वाजिब मुनाफा लेते हुए तो काम कर ही सकते हो। आज के समय में ये भी एक सेवा ही है।


आओ संकल्प ले कि हम जो भी व्यापार करते है उनमें अपना वाजिब मुनाफा लेते हुए अपने सारे स्टॉक को बेचेंगे। यही आज के समय की बड़ी सेवा है।


इन तस्वीरों में मरीजों की जगह खुद को या अपने किसी परिजन को रख कर सोच लो क्या गुजरती होगी  इन लोगों पर

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

आक्सीजन के लिए हाहाकार

आक्सीजन के अभाव में दम तोड रहे मरीज

देश में कोरोना की दूसरी लहर ने आक्सीजन के अभाव में मरीजों को दम तोड़ने पर मजबूर कर दिया है

विभिन्न राज्यों से कोरोना मरीजों का आक्सीजन के अभाव में दम टूट रहा है जिस पर विडंबना ये कि हम विश्व में आक्सीजन निर्यात करने वाले सबसे बड़े निर्यातक है। 

आखिर ये स्थिति आई कैसे?

आक्सीजन के सबसे बड़े निर्यातक को 50 हजार मिट्रिक टन आक्सीजन आयात करनी क्यों पड़ रही है? इसे मिस मैनेजमेंट कहा जाए या  जानबूझ कर  की गई लापरवाही। हमें ये आभास ही नही था कि देश में आक्सीजन के लिए इस तरह हाहाकार मच सकता है हम आक्सीजन का निर्यात दुगना करते रहे पिछले साल जहां हमनें  4500 मिट्रिक टन इंडस्ट्रियल आक्सीजन निर्यात की वहीं इस साल जनवरी तक 9000 मिट्रिक टन निर्यात की। हमारे सत्ताधारी नेता कहते है कि जो आक्सीजन निर्यात करते है वो इंडस्ट्रियल आक्सीजन है जबकि  इसे मेडिकल आक्सीजन में बदला जा सकता है।

प्रश्न ये है कि जब इंडस्ट्रियल आक्सीजन को मेडिकल आक्सीजन में बदला जा सकता है तो फिर हमनें ये तैयारियां क्यों नही रखी। और तो और पूरे देश में आक्सीजन सप्लाई करने वाले टैंकर भी सिर्फ 2000 ही है। क्या ये 135 करोड़ देशवासियों के लिए पर्याप्त है? क्या हमें दूसरी लहर के आने पर अपने इंतजाम पूरे नही करने चाहिए थे ? 

प्यास लगने पर कुआं खोदने की आदत 

हमनें इस ओर ध्यान दिया ही नहीं।  आफत आने पर कुआं खोदने की हमारी प्रवृति ने लाखों लोगों की जान पर ला दी। अब हम इंडस्ट्रियल आक्सीजन को भी मेडिकल आक्सीजन में बदलने के निर्देश दे रहे है तो निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा रहे है इसके अलावा आक्सीजन का आयात भी करने के आर्डर दे रहे है। लेकिन जिस प्राणवायु के 2 सेकेंड के लिए भी बाधित होने पर मरीज की जान पर बन आती है उसके लिए दिनों इंतजार करने तक तो हज़ारों लोग काल कलवित हो जाएं तो आश्चर्य कैसा ?  

केंद्र सरकार करती है नियंत्रित आक्सीजन सप्लाई

देश में जितने भी आक्सीजन उत्पादन इकाईयां है इनका नियंत्रण केंद्र सरकार करती है। वह ही तय करती है की किस राज्य को कितनी आक्सीजन सप्लाई करनी है। कितनी इंडस्ट्रियल और कितनी मेडिकल आक्सीजन उत्पादित होगी और किस तरह उसका वितरण होगा?

हमारा डिजास्टर मैनेजमेंट फेल

 अब अगर केंद्रीय डिजास्टर मैनेजमेंट सबल होता और सीरी की रिपोर्टों को गंभीरता से लिया जाता तो आज ये स्थितियां नहीं आती। हमनें न तो सीरी की रिपोर्ट को तवज्जो दी और न ही आपातकाल में डिजास्टर मैनेजमेंट की तकनीक का इस्तेमाल ही किया।

भावी संकट की हमें जानकारी थी लेकिन हमनें ये नहीं सोचा था कि एक दिन में 3 लाख लोग भी कोरोना पॉजिटिव आ सकते है लेकिन डिजास्टर मैनेजमेंट ही तो हमें ये बताता है कि संकट के लिए हमें कैसे व्यवस्थाएं करनी है लेकिन हमने या तो इस ओर ध्यान दिया ही नही या फिर हमारा डिजास्टर मैनेजमेंट इतना निकम्मा है कि उसके संकट के समय हाथ पांव फूल जाते है।

हमारे नेता अपने अपने हिसाब से बयान देते है सत्ताधारी नेता अपनी सरकार का पक्ष लेते है तो विपक्ष के नेता अपने हिसाब से।  जबकि देश की जनता पर जब संकट हो तो हर नेता को ईमानदारी से पक्ष विपक्ष को भूलकर वास्तविक स्थिति को देश के सामने रखना चाहिए ताकि उसकी कमियों को दूर किया जा सकें।

शनिवार, 17 अप्रैल 2021

लौट आया कोरोना

 

लौट आया कोरोना

जी हां, कोरोना फिर से लौट आया है। पिछले साल मार्च में ही इसने अपना पहला कदम रखा था  अब ये एक साल का होकर दौड़ने लगा है। जी हां इसकी रफ्तार पिछले साल से दुगुनी है और कहीं कहीं तो ये तिगुनी चौगुनी रफ्त्रार से भागने लगा है।


क्या उपाय किए हमनें ?


 जब ये लौट ही आया है तो हमें आंकलन तो करना ही पड़ेगा कि जब विश्व के दूसरे देशों में ये दूसरी लहर के रूप में फैल रहा था तो हमने अपने देश में क्या उपाय किए?  हमनें वेक्सिन तो बना ली लेकिन उसका भंडारण नही किया हमनें दूसरे देशों को बांटकर अपने बड़े होने का अहसास कराया। पी पी ई किट का उत्पादन शुरू किया लेकिन जरूरत जितना उत्पादन भी हम कर पाए या नही ये आने वाले दिनों में सामने आ जाएगा।

हमनें वेंटीलेटर का उत्पादन भी शुरू किया लेकिन उनमें से 90%  काम ही नहीं कर रहे। हमनें  पहले दौर में रिमेडिवर दवा की कमी को पूरा किया लेकिन दूसरे दौर में भी ये दवाएं कम ही पड़ रही है।


तो फिर हमनें तैयारी क्या की?


हमने तैयारी की चुनावों की, हमनें तैयारी की कुंभ की, हमने तैयारी की राममंदिर के निर्माण की, जिस जिस की तैयारिया की वे सब चल रही है। चुनाव हो रहे है, कुंभ चल रहा है, राम मंदिर की नींव पड़ रही है। यानी जिन जिन चीजों की हमने तैयारियां की वे सफलता से हो रही है।


हमनें तैयारी नही की दूसरी लहर पर आने पर उसके लिए क्या करना है उसकी? आज स्थिति ये है कि जिस तेज रफ्तार से ये लौट आया कोरोना फैल रहा है  उसकी रोकथाम के लिए न हमनें अस्पतालों में बिस्तर बढ़ाए न वेंटीलेटर न टीकाकरण के लिए पर्याप्त टीको का स्टॉक ही रखा। हमारी तैयारियां ही नहीं थी कि अगर दूसरी लहर आई तो वो कितनी खतरनाक हो सकती है। हमनें न आक्सीजन उत्पादन के कोई प्रयास किए अगर किए होते तो आक्सीजन आयात नहीं करनी पड़ती। न हमने दवाइयों का स्टॉक ही रखा और न ही हमने विकट परिस्थितियों के लिए कोई तैयारी ही की। हमने तो सोचा अब गया कोरोना अब वह हमारे देश में तो आ नही सकता इसलिए हमने बेफिक्र होकर चुनाव कराएं, हमने बेफिक्र होकर अपने टिके दूसरे देशों को बांटे और तो और हमने बेफिक्र होकर कुंभ के स्नान भी कराएं जैसे है इस बीमारी से अजेय हो गए।


अब जब पिछले साल के आंकड़े भी बौने लगने लगे है तो हम कुंभ को भी प्रतिकात्मक करने की सलाह दे रहे है, हम दो गज दूरी की भी सलाह दे रहे है और तो और  पिछली बार की तरह ही फिर से लॉक डाउन भी कर रहे है। फिर एक बार देश में हड़बड़ी मच रही है, मजदूर पलायन कर रहे है। लोग अपने गांवों को लौट रहे है ये सोचकर कि न जाने कब पिछली बार की तरह लंबा लॉक डाउन हो जाएं।


हमने सबक कुछ सीखा ही नही


वास्तव में अगर हम विवेचन करें तो लगता है हमने न तो पिछले अनुभव से कुछ सीखा और न ही जब दूसरे देशों में दूसरी लहर चल रही थी तब अपने यहां कोई तैयारी रखी। फिर वही अस्पतालों में बिस्तर की कमी, वही आक्सीजन के अभाव में मरते कोरोना मरीज, वही अस्पतालों में वेंटीलेटर का अभाव फिर वही शमशानो और कब्रिस्तानों में अंतिम संस्कारों की लाइन, पहली लहर से भी ज्यादा मरते लोग। 


आखिर हमने पिछले एक साल में किया क्या? 


ईमानदारी से अगर हम विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि हमने पिछले एक साल में दावे किए वेक्सिन बनाने के लेकिन जरूरत के समय वो भी कम पड़ गई। हमने दावे किए वेंटीलेटर बनाने के लेकिन फिर भी वे अस्पतालों में नही पहुंचे और अगर पहुंचे भी तो उन्हे आपरेट करने वाले लगाए ही नहीं,  हमने दावे किए सभी व्यवस्थाएं कर लेने की लेकिन दूसरी लहर के शुरुआत में ही हमारे हाथ पांव फूलने लगे है।


सोचना देश को है कि हमने क्या खोया और क्या क्या खो सकते है? क्योंकि हमारी तैयारियां और दावों की तस्वीर हमारे सामने है ।

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया के नाम आम नागरिक की पाती

 


मेरे देश के प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मालिकों, आपको ये पाती ऐसे समय (आम नागरिक) लिख रहा हूं, जिस समय देश के मीडिया को लोकतंत्र की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने की जरूरत है,आप द्वारा दिखाई जाने वाली खबरों से देश की जनता लोकतंत्र की दशा व दिशा तय करती है, ऐसे समय में चौथे स्थंभ की जवाबदेही ज़्यादा हो जाती है। 

सोशल मीडिया पर जिस तरह के प्रचार हो रहे है उससे जनता असमंजस में है , तरह तरह की अफवाहें आम नागरिक को भृमित कर रही है, आज आम नागरिक ये समझ नही पा रहा कि सोशल मीडिया व मीडिया द्वारा दिखाई जा रही  खबरें कितनी विश्वनीय है, कई चैनल किसी एक राजनैतिक दल के लिए काम करते दिखाई देते है तो कुछ किसी अन्य के पक्ष में। चैनलों पर जो चर्चाए हो रही है उनका कोई निष्कर्ष नही निकलता।

 क्या चैनल टाइम पास कर रहे है? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की ये जिम्मेदारी है कि वो जनता को पूरी ईमानदारी से निष्पक्ष रहकर जनता को सच्चाई से अवगत कराएं। मीडिया को सरकार की उन कमियों को उजागर कर जनता को जागरूक करना चाहिए जिनमे सरकार कोई गलत कदम उठाती है, जबकि आम नागरिक इस समय ये महसूस कर रहा है कि कुछ चैनल तो केवल सरकारी भोपू बन रहे है। 

सरकार के अच्छे कदमो की जहां प्रंशशा होनी चाहिए वहीं गलत कदमों की खुल कर आलोचना भी करनी चाहिए, तभी लोकतंत्र की रक्षा संभव होगी, जिसमे चौथे स्तंभ की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है।

क्या हमारे देश का मीडिया विश्व स्तरीय विश्वसनीय नही होना चाहिए? आज इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया की देश मे बाढ़ आई हुई है कोई चैनल किसी के गुणगान कर रहा है तो कोई किसी के इससे आम आदमी भृमित हो रहा है उसे निणर्य करने में परेशानी हो रही है कि वो किस चैनल को विश्वसनीय समझें? ऐसा इसलिए हुआ है कि एक ही विषय पर कोई चैनल कुछ और परोस रहा है तो कोई कुछ जबकि सच्चाई तो शाश्वत होती है फिर ये विरोधाभास क्यों? 

इसका तात्पर्य ये है कि चैनल सच्चाई नहीं खोज कर सिर्फ अपने अपने सूत्रों के हवाले से खबरें परोस रहे है, जबकि अगर खोजी ख़बर हो तो उसमें सभी चैनल के पास सच्चाई की एक ही रिजल्ट आएगा। इससे साबित होता है कि हर चैनल अपने अपने आकाओं से फिड बैक लेकर अपनी अपनी राग अलाप रहे है। इससे मीडिया किसी एक पक्ष का होता दिखाई देता है।

लोग हमारे देश के सैकड़ों चैनलों को छोड़कर फिर से विश्वनीय खबरों व विश्लेषण के लिए बीबीसी जैसे चैनलों  की ओर वापस सुनने लगे है । क्या ये हमारे देश के चैनलों के लिए एक प्रश्नचिन्ह नही है कि सैकड़ो चैनलों को छोड़कर लोग विदेशी चैनलों की ख़बरो को सुनना पसंद कर रहा है? इस पर विचार करने की जरूरत है। 

आपसे आम नागरिक की अपील है कि आप विश्वस्तरीय विश्वसनीय मीडिया हाउस बने, हिंदुस्तान के चैनलों को पूरे विश्व मे बीबीसी की तरह विश्वसनीय माना जाए। लेकिन इसके लिए आपको निष्पक्ष रहना होगा। जनता को सच्चाई दिखानी होगी ताकि वो लोकतंत्र के लिए ऐसी सरकार चुन सके जो कल्याणकारी साबित हो और इसमें मीडिया की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। 

आपकी  अस्पष्टता जनता के मानस को बदल सकती है।क्या आपने इसे बिजनेस बना लिया है ? जबकि मीडिया तो वो कड़ी है जिससे जनता का मानस बनता बिगड़ता है ऐसे में आपकी जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है, जो सरकारों को बना सकता है और सरकारों के गिरने का कारण बन सकता है।

आप अगर निष्पक्ष नही रहेंगे और खोजी पत्रकारिता नही करेंगे तो कुछ समय के लिए तो आपसे जनता भृमित हो सकती है लेकिन धीरे धीरे जनता अपना रास्ता दूसरा चुन लेती है, जिसमे बीबीसी जैसे चैनल वापस देखे जाने शुरू हो सकते है। और अगर ऐसा होता है तो ये भारतीय मीडिया के लिए शर्मनाक स्थिति से कम नही हो सकता। 

देश की आबादी करीब 130 करोड़ के आसपास है, उसमे से चैनलों को देखने वाले लोग कितने है आप जानते है, ये जागरूक व कुछ निर्णय लेने वाले होते है और उनका निर्णय, आपके द्वारा दिखाए गए विश्लेषणों के आधार पर होता है। अगर ये लोग या इनका एक बड़ा तबका, बीबीसी जैसे चैनलों में विश्वनीयता खोजने लगा तो ये न केवल भारतीय मीडिया के लिए शर्मनाक होगा बल्कि विश्व मे भारतीय मीडिया की छवि भी खराब होगी।

अतः आपसे आम नागरिक का निवेदन है कि आप जनता को निष्पक्षता से बिना किसी लाग लपेट के सही व विश्वसनीय विश्लेषण दिखाए जिससे न केवल भारतीय मीडिया की विश्वनीयता बढे बल्कि हमारे लोकतंत्र को भी मजबूती मिले। आप खुद जानते है कि आप जनता को मूल मुद्दों से भटका कर क्या परोस रहे है? 

आरक्षण पर लोगो का मानस क्या है आपसे छुपा नही है, संसद में महत्वपूर्ण कार्य होने के बजाय शोर शराबा होता है। जबकि जनहित के बिल रुक जस्ते है और सांसदों के लाभ के बिल पास हो जाते है, हमारा मीडिया चुप रहता है,इसी तरह पब्लिक संबंधित बहस नही होकर ऐसे मुद्दों पर समय जाया किया जाता है जिनका पब्लिक का कोई भला नही होना। जिसमें श्री देवी की मौत, सलमान खान की गिरफ्तारी व जमानत की ख़बरे दिन भर चलती है। जबकि बैंक घोटाले, घोटालेबाजो का देश छोड़कर भागना,एफडीआई, जीएसटी , पेट्रोल डीजल के दाम आदि  कईं मुद्दे जनता व सरकार के बीच चर्चा के होने चाहिए, यही नहीं  इन पर पूरी खोजपूर्ण खबरें जनता के समक्ष सच्चाई से आनी चाहिए थी। जिसमे सरकार का ध्यान उन कमियों की ओर दिलाना चाहिए जिनसे ऐसे घोटाले नही हो सके।

आपसे आम नागरिक ये अपेक्षा रखता है कि आप लोकतंत्र को मजबूत रखने के लिए जनता को सही व निष्पक्ष रास्ता दिखाएंगे अगर आपकी भूमिका निस्जपक्ष नही रही तो लोकतंत्र को जो नुकसान होगा उसके लिए मीडिया  को कभी माफ नही किया जा सकेगा।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

37 साल पहले चुनाव आयोग ने किया था EVM का प्रयोग, कराना पड़ गया था बैलेट पेपर से मतदान


    
चुनाव के शोर में उस पहले चुनाव के बारे में भी जान लीजिए जो 1982 में पहली बार ईवीएम से हुआ था. उस चुनाव के दिलचस्प विवाद और नतीजे की कहानी मज़ेदार है.

हमारे देश में हर चुनाव के बाद ईवीएम की अग्निपरीक्षा शुरू हो जाती है. जीतनेवाला चुप रहता है लेकिन हारनेवाला खूब शोर मचाता है.. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदुस्तान में पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल कब हुआ और उस चुनाव का नतीजा क्या रहा?

वो साल 1982 था और प्रयोग का मैदान था केरल की परावुर विधानसभा का उपचुनाव. छोटी और शांत विधानसभा प्रयोग के लिहाज से चुनाव आयोग को ठीक लगी होगी. यहां 123 में से 50 मतदान केंद्रों पर ईवीएम का इस्तेमाल करके देखा गया.  मुकाबले में थे कांग्रेस के ए सी जोस और सीपीआई के के सिवन पिल्लई
मतदान से पहले ही सीपीआई वाले के सिवन पिल्लई ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी और ईवीएम की उपयोगिता और इस्तेमाल पर सवाल खड़े कर दिए. चुनाव आयोग अदालत में पेश हुआ. मशीन का इस्तेमाल करके दिखाया. कोर्ट ने संतुष्ट होकर मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया.

कमाल देखिए. ईवीएम पर भरोसा ना करनेवाले सीपीआई के पिल्लई साहब ने चुनाव में 2 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज कर ली.
EVM पर भरोसा ना करनेवाले सीपीआई के उम्मीदवार सिवन पिल्लई को EVM से हुए मतदान में जीत मिली थी

अब बारी कांग्रेस के ए सी जोस की थी. वो भी हाईकोर्ट जा पहुंचे. उन्होंने दलील रखी कि आरपी एक्ट 1951 और कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स 1961 ईवीएम के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देते हैं. हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के पक्ष में ही फैसला दोहराया मगर हार से दुखी जोस साहब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंचे. इस बार सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि उन 50 पोलिंग बूथ पर फिर से वोटिंग कराई जाए जहां ईवीएम का इस्तेमाल हुआ था, और वोट मशीन से नहीं बैलेट पेपर से डाले जाएं. सुप्रीम कोर्ट ने मशीन में गड़बड़ी जैसी कोई बात नहीं कही थी लेकिन ईवीएम का इस्तेमाल कानूनी होने तक रुकने पर सहमति बनी.

कांग्रेस प्रत्याशी जोस कब तक ईवीएम के समर्थक थे जब तक हार का मुंह नहीं देखा खैर फिर से मतदान हुआ. इस बार नतीजा उलट गया. 2 हज़ार से ज्यादा वोटों के अंतर से हारे जोस साहब ने 2 हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीत लिया.

देशभर के मीडिया में जमकर सुर्खियां बनीं. वो तब की बड़ी घटना थी. मशीन का पहली बार इस्तेमाल हुआ था लेकिन लौटकर बैलेट पेपर पर ही आने से ये खबर और बड़ी हो गई. कांग्रेस के प्रत्याशी ए जी जोस वैसे भी केरल विधानसभा के स्पीकर रह चुके थे. उनका कद बहुत बड़ा था. ज़ाहिर है उनकी हार से बड़ा झटका भी महसूस किया गया होगा.

इस चुनाव के डेढ़ दशक बाद तक ईवीएम का प्रयोग नहीं किया गया. 1998 वो साल था जब दिल्ली, मध्यप्रदेश और राजस्थान में विधानसभा चुनाव के दौरान 16 सीटों पर एक बार फिर प्रयोग हुआ. प्रयोग चल निकला. आखिरकार 2004 में पूरे देश ने लोकसभा चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल किया.

नितिन ठाकुर की वॉल से साभार

शनिवार, 14 नवंबर 2020

बिना पटाखों की दीपावली, घी के दिए जलाकर करें वातावरण को शुद्ध

 



अनुभूत करें भगवान राम के अयोध्या लौटने के असली दिन को


दीपावली पर पटाखें न फोड़े और दीपावली मनाएं , कितना अजीब लगता होगा ये आज से 50-60 वर्षो पहले कहना। उस समय लोग ये कहने वाले को कितना मूर्ख समझते होंगे, उसका कितना मजाक बनता होगा।


 लेकिन 2020 की 14 नवम्बर की दीपावली वास्तव में बिना पटाखों वाली दीपावली है। सरकार ने भी पटाखों को बेचने और चलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि कभी दीपावली भी बिना पटाखों के मनानी पड़ सकती है।


कोरोना वायरस ने जब मार्च में  होली पर अपनी उपस्थिति दर्ज की थी तो किसी ने सोचा नहीं था कि  ये बीमारी इतनी लंबी चलेगी और दीपावली के पटाखे चलाने की परम्परा को भी ये डस लेगी। जी हां ये डसना ही है । दीपावली का मतलब ही पटाखों का पर्याय होता है लेकिन कोरोना ने इस मतलब को बदल दिया है। हालांकि पिछले काफी वर्षो से पटाखों से  बढ़ते वायु प्रदूषण  से सरकारें  लोगों को आगाह करती आईं है और अपील करती रही है कि वे केएम से कम पटाखे जलाएं ताकि वायु प्रदूषण कम हो। दिल्ली में तो बाकायदा पटाखों का समय निर्धारित कर दिया गया कि निर्धारित समय के बाद पटाखे ऩ छोड़े जाएं लेकिन पूर्णतः प्रतिबन्ध नहीं लगाया। लेकिन इस बार तो कोरोना वायरस के कारण पटाखों पर बाकायदा पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। 


सरकारों ने पटाखें बेचने के लाइसेंस नहीं दिए है और जिनके पास स्थाई लाइसेंस थे उनके लाइसेंस भी रद्द कर दिए है। और तो और अगर आप सोच रहे है कि कोई बात नहीं बेचने पर प्रतिबन्ध लगाया है सरकार ने ,तो हमारे पास तो पहले से ही है ,एचएम उन्हें छोड़कर अपनी दीपावली पटाखों वाली मना लेंगे । तो जनाब ये भी नहीं कर सकेंगे इस बार आप। आपके पटाखे आपकी अलमारी को शोभा ही बढ़ा सकते है या फिर आप उन्हें देख कर आभास कर सकते है क्योंकि आप उन्हें छोड़ नहीं सकते। सरकार ने पटाखें बेचने के साथ साथ छोड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। 


कोरोना ने लगाई लगाम


कोरोना ने पटाखों पर लगाम लगा दी है। क्योंकि पटाखों से वातावरण में प्रदूषण बढ़ जाता है और ये प्रदूषण कोरोना मरीजों को श्वास की तकलीफ कर सकता है। इस  बीमारी में अधिकाश मौत श्वास की तकलीफ से ही होती है। मरीज के फेफड़े सामान्य श्वास भी लेने में दिक्कत महसूस करते है  और अगर फिर प्रदूषित हवा मिलने से तो जिन मरीजों की स्थिति सामान्य है उनकी पटाखों से प्रदूषित हुई हवा जान लेवा साबित हो सकती है। इसलिए सरकार ने इस बार पटाखों पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा दिया है।


घी के  दिए जलाकर मनाएं दीपावली


जब भगवान रामचन्द्र जी लंका से जीतकर अयोध्या आए थे तो लोगों ने अपने घरों पर घी के दिए जलाकर खुशियां मनाई थी। उस समय पटाखों का प्रचलन नहीं था। लोगों ने घी और तेल के दिए जलाकर इस त्यौहार को मनाने की शुरुआत की थी आज हजारों साल बाद फिर लोगों को घी और तेल के दिए जलाकर दीपावली मनानी पड़ रही है। हालांकि असली दीपावली तो घी और तेल के दिए जलाकर ही मनाई जाती है लेकिन कालांतर में इसमें पटाखों ने कब अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया पता ही नहीं चला। वर्तमान पीढ़ी तो दीपावली का मतलब ही पटाखों का त्यौहार मानती है। पटाखें नहीं जलाना मतलब अपनी खुशियों को मन मसोस कर दबाना। इसे सरकार का जबरस्ती का थोपा गया आदेश मानना। जबकि वास्तव में असली दीपावली तो घी के दीयो की ही होती है ये आज की जनरेशन जानती ही नहीं।


माटी के दीयों की सुगन्ध, घी की बाती से सरोबार होकर प्रदूषित वातावरण को शुद्ध करने को आतुर



प्रकृति ने खुद ही  भगवान राम के उस दिन अयोध्या लौटने के दिवस को एक बार फिर उसी रूप में मनाने को हमें विवस कर दिया है। देखे,महसूस करे और अनुभव प्राप्त करे, इस बार कि भगवान राम के अयोध्या लौटने के उस दीपावली के दिन भी कुछ ऐसा ही रूप था, जिसमें पटाखों की गूंज नहीं थी लेकिन घी के दीयों की वातावरण को शुद्ध करने वाली सौंधी माटी की सुंगध थीं। आज फिर हजारों वर्षो बाद उसी वातावरण को निर्मित करने का अवसर आ गया है जिसमें एक बार फिर वहीं माटी के दीयों की सुगन्ध घी की बाती से सरोबार होकर प्रदूषित वातावरण को शुद्ध करने, भगवान राम के समय के वातावरण निर्मित करने को आतुर है। उस काल में हम नहीं थे लेकिन उस काल की परिस्थितियां बनाने का एक अवसर हमें प्रकृति ने जरूर दे दिया है जिसे हमें जी कर न केवल वायु प्रदूषण को रोकना है बल्कि देश के करोड़ो लोगों को सांस की तकलीफ से भी बचाना है। अगर इस समय हमनें नहीं सोचा तो एक ही काल रात्रि में ये दीपावली का त्यौहार हजारों लाखों लोगों की जिन्दगी पर तो भारी पड़ेगा ही साथ ही उस काल के वास्तविक अनुभव से भी हमें वंचित कर देगा।


आइए हम सब मिलकर भगवान राम के उस वास्तविक दिन को अनुभूत करें जिस दिन वे अयोध्या लौटे थे और लोगों ने घी के दिए जलाकर वातावरण को शुद्ध बनाया था।


बुधवार, 21 अक्टूबर 2020

चिराग पासवान पाला बदल सकते है

 बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव की जन सभाओं में जो भीड़ उमड़ रही है वो बिहार में बदलाव की स्पष्ट कहानी कह रही है। इससे नीतीश के जेडीयू और बीजेपी में बैचैनी बढ़नी स्वाभाविक ही है।

 इस बीच रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान एल जे पी ने एन डी ए से नाता तोड लिया है ये कहकर कि मोदी से कोई बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं। अब तेजस्वी की जन सभाओं में भारी भीड़ ने उनके पिता की भविष्य दृष्टा की झलक उनमें भी दिखाई देती है।

 नीतीश का चिराग के खिलाफ जन सभाओं में जिस तरह बोला जा रहा है वो न केवल चिराग को जे डी यू से दूर कर रहा है बल्कि बीजेपी से भी उन्हें धीरे धीरे दूर करता दिखाई देता है। नीतीश की सभाओं में बीजेपी के नेता भी होते है और उनकी चुप्पी ही एक तरह से नीतीश की कहीं गई बातों में उनकी सहमति मानी जा सकती है और यही वो वजह होगी जो बिहार में चुनाव परिणामों  के बाद परिस्थितियों को बदलने वाली साबित हो सकती है।

जो चिराग अभी अपने को मोदी का हनुमान बता रहे है वे विपरीत परिणाम आते ही मौसम की तरह बदल जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कारण अगर तेजस्वी की आर जे डी और कांग्रेस को बिहार में बहुमत मिलता है तो चिराग बीजेपी नेताओं के, नीतीश की सभाओं में उपस्थित रहते हुए उनके बारे में किए गए प्रलाप को उनकी मौन स्वीकृति बताते हुए बीजेपी से किनारा करने का  बड़ा कारण बता सकते है। वे यहां तक कह सकते है कि वे तो अंत तक कहते रहे कि वे मोदी के हनुमान है लेकिन  बीजेपी ने और मोदी ने नीतीश को मेरे बारे में अनर्गल प्रलाप करने से नहीं रोका इस वजह से इस हनुमान की आस्था टूट गई और वे  इस एलाइंस से नाता तोड़ते है।

चूंकि रामविलास पासवान हमेशा, चाहे किसी की भी सत्ता रही हो वे सत्ता में रहे है इसी वजह से उन्हें  राजनीति का मौसम विज्ञानी भी कहा जाता रहा है, उसी के अनुसरण में  उनके पुत्र चिराग पासवान भी अगर तेजस्वी से हाथ मिला लें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चहिए। वे पाला बदल कर बिहार में सत्ता में आने वाली पार्टी से हाथ मिला ले तो  भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए वो चाहे फिर किसी भी दल का क्यों न हो। 

तेजस्वी ने चिराग पासवान के साथ नीतीश के बर्ताव पर बयान देकर ये संकेत भी दे दिया है कि अगर जरूरत पड़ी तो वे चिराग का साथ भी ले सकते है हालांकि उनकी जन सभाओं में उमडती भीड़  ये स्पष्ट संकेत दे रही है कि उनको शायद इसकी ज़रूरत ही न पड़े लेकिन राजनीति में रास्ते खुले रखने पड़ते है न जाने कब किसकी जरूरत पड़ जाएं।

चिराग पासवान ने भी किसी भी तरफ जाने के अपने रास्ते खुले रखे है। अगर जेडीयू और बीजेपी  एलाइंस की सरकार आती भी है तो मोदी के हनुमान को तो  तव्वजों देनी पड़ेगी और अगर नहीं आती है तो बीजेपी नेताओं का उनके बारे में नीतीश की टिप्पणी पर मौन रहना इस हनुमान का मोह भंग होने का एक कारण बनते भी देर नहीं लगेगी। और अगर आरजेडी और कांग्रेस की सरकार आती है तो तेजस्वी ने जो चिराग पासवान के प्रति सहानुभूति चुनावी सभाओं में दर्शाई है वे नजदीकियो का बड़ा कारण बन सकती है। इससे चिराग के लिए सत्ता के नजदीक रहना आसान ही रहेगा। हांलांकि ये सब उनकी पार्टी की विधानसभा में लाई गई सीटों पर निर्भर करेगा कि वे कितने पावरफुल होंगे। अपने पिता की मृत्यु की सहानुभूति उन्हें कितनी मिलती है ये भी एक फेक्टर होगा। लेकिन ये तय है कि सत्ता चाहे किसी की आए चिराग पासवान राज्य या केंद्र की सत्ता के आसपास ही रहेंगे।


रविवार, 18 अक्टूबर 2020

सिन्धु नदी समझौते पर पुनर्विचार की अटकलें

 

ये पोस्ट मेरी 4साल पहले  फेस बुक पर उस समय लिखी जिस समय मोदी सरकार पाकिस्तान का पानी रोकने की बातें कर रही थी। उस समय उरी हमले के कारण पूरे देश में आक्रोश था।


इन दिनों मीडिया में सिंधु नदी समझौते पर पुनर्विचार की चर्चाए जोरो पर है।कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी इस पर गंभीरता से विचार कर रहे है। मीडिया में बताया जा रहा है कि भारत 1960 में पाकिस्तान से हुए सिंधु समझौते को रद्द कर सकता है। जिससे पाकिस्तान का पानी बंद किया जा सकता है। पाक समर्थित आतंकियों द्वारा उरी हमले के बाद देश भक्ति का ज्जबा भारतीय जनता में कुछ ज्यादा ही है। हर कोई चाहता है कि पाकिस्तान को सबक सीखा देना चाहिए। 

ऐसे में ये समाचार आना कि सिंधु जल समझौते पर प्रधानमन्त्री मोदी  पुनर्विचार कर रहे है और पाकिस्तान को सिंधु नदी का पानी  बंद किया जा सकता है। जनता की भावनाओं का फायदा उठाकर वाह वाह मोदी , ऐसा प्रधानमंत्री पहली बार आया है जो अब पाकिस्तान को सबक सीखा सकता है, जैसे जुमले सुने जा सकते है।  मीडिया में इस तरह की वाह वाही लूटकर प्रधानमन्त्री मोदी को महिमा मंडित किया जा रहा है। 

ये ऐसी नीति है कि जिसे इस तरह प्रचारित किया जा रहा है जैसे लोग मोदी को ही नेता मानने लगे ।

 अब आपको थोड़ा सा पीछे ले चलता हूं जिसमे मीडिया में अभी कुछ दिनों पहले ही  उरी के हमलें का बदला लेने का समाचार जोर शोर से प्रचारित किया गया जिसमे पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक करने की बात जनता मीडिया के माध्यम से बताई गई। कई नेताओ व समर्थको ने तो  मोदी को 56 इंच के सीने वाला नेता बताते हुए विपक्ष को निशाना बनाया गया। 

जबकिअभी हाल ही में  सुप्रीम कोर्ट में विदेश सचिव ने बताया है कि सर्जिकल स्ट्राइक इससे पहले भी होती रही है लेकिन इस तरह उन्हें कभी प्रचारित नही किया गया। 

पाकिस्तान के साथ जिस सिंधु समझौते को रद्द करने अथवा पुनर्विचार करने की बाते की जा रही है वो भी सर्जिकल स्ट्राइक के बड़बोले पन की तरह की खबरे है जबकि हकीकत यह है कि सिंधु समझौते के तहत भारत अपने हिस्से का पूरा पानी उपयोग ही नही कर रहा। हम अपने हिस्से का पानी उपयोग करने की स्थिति में नही है इसलिए वो पानी पाकिस्तान जा रहा है। 

दरअसल उस पानी का उपयोग करने पर विचार किया जा रहा है जबकि प्रचारित यूं किया जा रहा है जैसे बस भारत पाकिस्तान का पानी रोकने ही वाला है और सिंधु नदी जल समझोते को रद्द करने वाला है। भारत की मीडिया के इस बहुप्रचारित खबरों का असर ये हुआ कि भारत ने तो पाकिस्तान का पानी बंद नही किया लेकिन चीन ने बर्ह्मपुत्र की एक सहायक नदी का पानी बंद कर दिया। 

भारतीय जनता में मोदी का प्रभुत्व जमाने के लिए प्रचारित इस समाचार का अंतराष्ट्रीय समुदाय में ये सन्देश गया कि भारत पाकिस्तान का पानी बंद करने जा रहा है । पाकिस्तान को भी भारत की इन मीडिया ख़बरों को अंतराष्ट्रीय जगत में भुनाने का मौका मिल गया और चीन ने पहला कदम उठा लिया। समझ नही आ रहा कि ये कैसी कूटनीती है जिससे लाभ तो हो न हो नुकशान पहले ही होना शुरू हो गया। 

जबकि सरकार ये जानती है कि सिंधु नदी समझौते में इतना ही किया जा सकता है कि भारत अपने हिस्से के पानी को रोक दे जिससे अंतराष्ट्रीय समझोते का उलघ्घन भी न हो और भारत की जनता की सहानुभूति भी बनी रहे। समझ से परे है कि इस तरह ढिढ़ोरा पिट कर क्यों हम अन्तराष्टिय समुदाय में अपनी विश्वनीयता में कमी ला रहे है। 

पाकिस्तान हमारे मीडिया की खबरें अंतराष्ट्रीय स्तर पर हमारे ही खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है। वो अंतराष्ट्रीय समुदाय को हमारे मीडिया की खबरे दिखाकर ये बता सकता है कि भारत में उसके खिलाफ ऐसी खबरे  दिखाई जा रही है  इन खबरों से वह अंतराष्ट्रीय समुदाय की भावनाए अपनी ओर बटोरने की कोशिश में कामयाब हो सकता है। ये कूटनीति भारतीय जनता को अपनी और आकर्षित करने के लिए तो सही हो सकती है लेकिन अंतराष्ट्रीय जगत में हमारी विश्वशनियता पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली साबित हो सकती है। जबकि मीडिया में ऐसी खबरे प्रचारित करने का एक मात्र उदेश्य जनता का रुख अपनी और करना मात्र ही  है। क्योकि मुदामुद्दी सरकार जानती है कि पानी रोकने की हद, वही तक उपयोग लाई जा सकती है 

जहा तक कि हमारें हक के पानी को पाकिस्तान जाने से रोकना । वह भी तब तक नही रोका जा सकता जब तक कि हम खुद उस पानी के उपयोग करने लायक नहरो का निर्माण नही कर लेते। क्योंकि हम पाकिस्तान को अपने हिस्से का पानी किसी सदायशता से या दयालुता से नही दे रहे , हकीकत ये है कि हमारे पास उस पानी को उपयोग में लेने लायक साधन ही उपलब्ध नही है इसलिए वो पानी पाकिस्तान जा रहा है और पाकिस्तान ने उस अतिरिक्त पानी के लिए अपनी नहरे विकसित कर ली है। 

उन नहरो में हमारे द्वारा उपयोग में नही लिए जा रहे पानी का जो हिस्सा पाकिस्तान जा रहा है उसका उपयोग 1960 से सिंधु नदी के किनारे बसे पाकिस्तानी गांव या शहर कर रहे है। जब भी  हम उस अतिरिक्त दिए जा रहे पानी को रोकोंगे तो पाकिस्तान अंतराष्ट्रीय जगत में हमारे मीडिया की इन खबरों को दिखाकर ये साबित करने की कोशिश करेगा  कि भारत ने हमारे पानी को रोक दिया है जैसे कि हमें पूर्व में ही आंशका व्यक्त की थी। भारतीय मीडिया की  ये खबरे उस समय पाकिस्तान के लिए अंतराष्ट्रीय समुदाय से सिम्पेथी प्राप्त करने का कारण बन सकती है। क्या इसे सफल दूरगामी कूटनीति कहा जा सकता है ?  इस तरह की नीति कुछ समय के लिए तो वाहवाही दिला सकती है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम हमारे लिए ही घातक सिद्ध हो सकते है। इसलिए अति उत्साह में हमें  अपनी नीतियों का खुलासा समय से पहले नही करना चाहिए। उचित समय और क्रियान्विति के बाद ही जरुरत होने पर ही खुलासा करना चाहिए।

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

किसान बिल से किसानों का कितना हित


केंद्र सरकार द्वारा किसानों के लिए तीन बिल पास किए है। सरकार कहती है इससे किसान खुशहाल होंगे जबकि विपक्ष और किसान संगठनों का कहना है कि इससे बड़ी बड़ी कम्पनियां किसानों का शोषण करने लगेगी जबकि सरकार का दावा है कि विपक्ष और किसान संगठन किसानों को भ्रमित कर रहे है।


सरकार का दावा है कि इन तीन बिलों से किसान अपनी फसल देश में कहीं भी बेचने को स्वतंत्र होंगे जबकि विपक्ष का कहना है कि वर्तमान में भी किसान अपनी फसल कहीं भी बेच सकते है लेकिन समस्या है कि वर्तमान का किसान अपनी फसल नजदीक की मण्डी तक  ले जाकर बेच नहीं पाता उसे सपने दिखाए जा रहे है कि को देश में कहीं भी जाकर, जहां उसे अच्छे दाम मिले, बेच सकता है। 


 विपक्ष का प्रश्न है कि किसान को पता कैसे चलेगा कि  उसकी फसल के दाम कहां अच्छे मिलेंगे और अगर उसे पता चल भी जाएं तो वो वहां तक अपनी फसल कैसे लेकर जाएगा इस पर सरकार का कहना है कि किसान आन लाइन ये सभी जानकारी ले सकेगा। किसान संगठनों तथा विपक्ष का इस पर कहना है कि किसान को अगर आन लाइन खरीद बेचान करना आता तो क्या वो बिजनेस नहीं कर लेता ? सरकार का ये तर्क विपक्ष और किसान संगठन को हास्यास्पद लगता है । उनका कहना है कि नेटवर्क की देश में क्या स्थिति है ये किसी से छुपा नहीं है अभी शहरों के घरों में कमरों से नेट के लिए बाहर खुले में आना पड़ता है तो जो किसान सड़कों से दूर जंगल में बैठा है उसे आन लाईन फसल बेचने की सलाह अक्ल के दीवालिएपन जैसा है। सरकार बड़े विकसित देशों की तरह के सपने दिखा रही है जबकि उनके जैसा इंफ्रास्ट्रक्चर तो पहले विकसित करें फिर ऐसी बाते करे तो कुछ अच्छी भी दिखे।


न्यूनतम समर्थन मूल्य को अनिवार्य क्यों नहीं कर रही सरकार?


विपक्ष तथा किसान संगठनों का कहना है कि सरकार इन बिलों को ऐतिहासिक बता रही है तो फिर इनमें न्यूनतम समर्थन मूल्य अनिवार्य क्यों नहीं किया गया। अगर सरकार इन बिलों में ये प्रावधान कर दे कि कोई भी आढ़तिए, कम्पनी आदि किसान से न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम भाव में उसकी फसल नहीं खरीद सकेगा। किसान को हर वस्तु का जो समर्थन मूल्य सरकार निर्धारित करे वो तो देना ही होगा। लेकिन सरकार ऐसा नहीं कर रही। फिर ये ऐतिहासिक कैसे कहा जा सकता है ?   किसान को उसकी फसल का न्यूनतम मूल्य तक देने में जिस सरकार को सोचना पड़े वो कितनी किसान का भला करने वाली हो सकती है कहने कि जरूरत नहीं। और फिर जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो 2011में वे केंद्र पर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की सिफारिश करते थे आज जब वे खुद प्रधानमन्त्री है तथा किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दे सकते है तब इधर उधर के फायदे तो गिना रहे है लेकिन किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का प्रावधान नहीं कर रहे। इससे विपक्ष और किसान संगठनों को प्रधान मंत्री को घेरने का ये अच्छा मुद्दा मिल गया है। 


उनका कहना है कि मोदी किसानों को नहीं अंबानी और अडानी को फायदा पहुंचाने को आमदा है क्योंकि अगर हर वस्तु का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित कर दिया जाए तो अंबानी अडानी और अन्य कम्पनियां उस न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम में फसल खरीद नहीं सकेगी जो इन कम्पनियों के लाभ को कम कर देगी और मोदी ऐसा कर नहीं सकते इसीलिए वे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने का कोई प्रावधान इन बिलों में नहीं करना चाहते।


कांट्रेक्ट फार्मिंग


सरकार का कहना है कि एक बिल में कांट्रेक्ट फार्मिंग की व्यवस्था से किसान की फसल उनके खेत से ही कम्पनियां उठा लेगी जिससे किसान आढ़तियों जैसे बिचौलियों से मुक्त हो जाएगा। कम्पनियां किसान से उसकी फसल की  दर तय कर कांट्रेक्ट कर लेगी जिससे किसान निश्चित हो सकेगा कि उसे फसल का कांट्रेक्ट के अनुसार मूल्य तो मिलेगा ही। 


दूसरी तरफ विपक्ष और किसान संगठन कुछ और ही कह रहे है उनका कहना है कि इससे तो किसान बड़ी बड़ी कम्पनियों के चंगुल में फंस जाएगा। कम्पनियां एक बार तो किसान से बाजार मूल्य से ज्यादा का कांट्रेक्ट कर लेगी और फिर उनके दाम बढ़ा देगी जिससे किसान को तो उसी कांट्रेक्ट मूल्य पर अपनी फसल कम्पनियों को देनी होगी जबकि बढ़े दामो का लाभ कम्पनियां उठा लेगी इससे किसान इन साहूकार कम्पनियों के चंगुल में फंस जाएगा।


यही नहीं विपक्ष का तो यहां तक कहना है कि सरकार   आवश्यक कमोडिटी एक्ट  में अधिकतम भंडारण की सीमा को समाप्त कर कालाबाजारी के रास्ते खोल रही है एक तरफ किसानों से फसल का कांट्रेक्ट कर उन्हें बाज़ार जाने से रोक दिया जाएगा दूसरी तरफ इन कम्पनियों के लिए चाहे जितनी मात्रा में भंडारण की छूट देकर सरकार उन्हें कालाबाजारी करने की खुली छूट दे रही है क्योंकि कोई सीमा नहीं होने से बड़े बड़े व्यापारी या कम्पनियां माल को रोक लेगी और फिर ऊंचे दामों पर बेचेगी जिससे किसान ही नहीं अाम आदमी भी महगांई से त्रस्त हो जाएगा। बाज़ार पर बड़ी बड़ी अंबानी अडानी जैसी कम्पनियों का बोलबाला हो जाएगा और वे मनमर्जी दाम वसूलेंगे। 


किसान संगठनों तथा विपक्ष का तो यहां तक कहना है कि ये सब बिल किसानों के हित के लिए नहीं बल्कि पूरी तरह योजनाबद्ध तरीके से बड़ी बड़ी कम्पनियों को फायदा दिलाने के लिए लाए गए है ताकि उन्हें परेशानी नहीं हो। वरना एक बिल में न्यूनतम समर्थन मूल्य का तो प्रावधान नहीं किया जाता जबकि व्यापारियों के लिए अधिकतम भंडारण की सीमा भी हटा दी गई है। उनका कहना है कि सामान्य सा अक्ल रखने वाला भी ये जान सकता है कि ये इस क्षेत्र में आने वाली बड़ी बड़ी कम्पनियों को कोई परेशानी न हो इसलिए उनकी हर बाधा को इन तीन बिलों से दूर किया गया है।

शुक्रवार, 12 जून 2020

योग और नमाज समान है फिर ये विरोध कैसा


 योग और नमाज का उदेश्य एक है शरीर को स्वस्थ रखना है ताकि इंसान स्वस्थ रहे । हिंदुओ के ऋषियो ने इसे योग नाम दिया तो मुसलमानो के अल्लाह से इसे नमाज नाम दिया । मुसलमानो के अल्लाह ने अपने अनुयायियो को मजबूत और स्वस्थ रखने के लिए दिन में 5 बार इसे करना जरुरी बताया जबकि हिंदुओं के ऋषियों ने कहा कि जिसे स्वस्थ रहना है वो योग करे अब जिन्होंने इसे अपनाया वे स्वस्थ है और जो स्वस्थ नही है उन्हें योग करना बताया जाता है । हिन्दुओ के ऋषियो तो मुसलमानों को अल्लाह ताला ने स्वस्थ रहने का रास्ता बताया है लेकिन हम ये  समझने के बज़ाय धर्म के नाम पर खोखली बातो में उलझे हुए है इसके मूल मर्म को नही समझकर अपनी ओछी मानसिकता का इज़हार कर रहे है । देखिए किस प्रकार योग और नमाज़ समान है :-

योग और नमाज अदा करने के दौरान होने वाली मूवमेंट शरीर को कुछ इस तरह से चुस्त दुरुस्त रखती है-

1- नियत बांधने का वैज्ञानिक फायदा-जब दायां हाथ बांये हाथ पर रखते हैं, दायीं हथेली के अंगुठे व तर्जनी से बांये हाथ की कलाई के छोर पर दबाव बना कर नाभि के पास उसे रखने से पूरा नर्वस सिस्टम रिलेक्स होता है। प्रेम को बढ़ावा मिलता है और ध्यान लगता है। ये एक्सरसाइज रीढ की हड्डी को रिलेक्स करता है। मसल्स कोआर्डिनेशन को संतुलित करता है।

2- रूकू अर्थात झुकना या अर्द्घशीर्षासन-यह स्थिति कमर की मांसपेशियों को मजबूत करती है। हैमिस्ट्रिंग व काफ मसल्स को मजबूत मिलती है और दर्द से राहत मिलती है। ये क्रिया घुटने के लुब्रिकेंट गूदे को मोबिलाइज कराती है।

 3- खड़े होना दोबारा-इसमें नार्मल सांस ली जाती है यानि कि योगा की भाषा में क्रिया कहा जाता है। मस्तिष्क को आराम मिलता है।

4- सजदा पढ़ते वक्त आधा शीर्षासन। इसके जरिये दिमाग तेज होता है। ब्लड सर्कुलेशन तेज होता है। आंख, नाक व कान की बीमारियों से बचाव, सिर में दर्द और चक्कर आने से राहत मिलती है। पाचन क्रिया दुरुस्त होने से जैसे शारीरिक फायदे।

5- बृजासान जैसी पोजीशन में बैठना- पाचन दुरुस्त करता है। आमतौर पर इसे खाना खाने के बाद किया जाता है, जिससे शरीर अम्लीय क्षार को सही तरीके से छोड़ता है। वायु और कब्ज के विकार को दूर करने में बेहद मददगार।

6- प्रथमा अंगुली को ऊपर उठाना-अंगुली उठाने से ब्लड प्रेशर संतुलित होता है। पूरे शरीर को बड़ी राहत मिलती है।

7- सलाम फेरना या गर्दन को बांयी से दांयी ओर घूमना- सरवाइकल के दर्द के लिये सबसे बेहतर एक्सरसाइज- गर्दन की मांसपेशियां मजबूत होती है तथा टिप्रीजियस मसल्स को मजबूत और सक्रिय करता है। जिससे कंधे की तमाम बीमारियों से मुक्ति मिलती है और उसकी मोबिलिटी को बढ़ाता है.

मंगलवार, 26 मई 2020

कोरोना ने हर ली हर किसी हालत

भारत में पहला कोरोना मरीज 30 जनवरी को केरल में पहचाना गया, जो चीन के बुहान से ही अाया था
उसके  50 दिन बाद यानी 22 मार्च को जनता कर्फ्यू और 25 मार्च से 21 दिन का लाक डाउन किया गया।

30 जनवरी से 22 मार्च तक केंद्र सरकार क्या करती रही?

केरल में पहले कोरोना केस की जानकारी तो केंद्र को हो ही चुकी थी और दूसरी तरफ चीन और अन्य देशों में ये महामारी फैल ही चुकी थी।  तो फिर 50 दिनों में कोरोना से लड़ने के लिए कोई योजना केंद्र सरकार ने क्यों नहीं बनाई? ये सवाल तो जनता पूछ ही सकती है। क्या केन्द्र सरकार को इस अवधि में कोई गाइड लाईन नहीं बना लेनी चाहिए थी ? ये एक सहज ही प्रश्न उभरता है एक सामान्य आदमी के जेहन में।

अगर सरकार सतर्क होती तो इन 50 दिनों में मजदूरों और प्रवासियों  को  जो अपने  घरों को जाना चाहे उन्हें  पहुंचाया जा सकता था। लेकिन सरकार ने लगता है इस 50 दिन की अवधि को यूं ही व्यर्थ गंवाया। उसने इस महामारी को गंभीरता से लिया ही नहीं।

22 मार्च जनता कर्फ्यू लगाने तक भी शायद सरकार इस महामारी से बचने की योजना नहीं बना सकी उसके 3 दिन बाद ही पूरे देश में 21 दिन का लाक डाउन लागू कर दिया गया। यानी 22 मार्च तक भी सरकार ये तय नहीं कर पाई थी उसे कोरोना से कैसे मुकाबला करना है, अगर 22 को तय कर चुकी होती तो  लोगों को अपने अपने घरों में पहुंचने की अपील कर सकती थी, लेकिन सरकार अनिश्चय की स्थिति में थी शायद वो सोच रही थी कि स्थिति नियंत्रण में अा जाएगी, लेकिन स्थिति नियंत्रण में होती दिखाई नहीं दी तो 25 मार्च से 21 दिन का लाक डाउन लगा दिया। इसका तात्पर्य 25 मार्च को 21 दिन का लाक डाउन घोषित करने तक भी सरकार ये सोचती रही कि इन 21 दिनों में हम  इस बीमारी पर नियंत्रण कर लेंगे तब भी  उसने मजदूरों, प्रवासियों को  वहीं रुकने की अपील की अगर सरकार की सोच में आगे और लाक डाउन बढ़ाने की सोच या कोई योजना होती तो वो मजदूरों व प्रवासियों को अपने घरों तक पहुंचने का समय देती और फिर लाक डाउन की घोषणा करती।  लेकिन 25 मार्च से लाक डाउन की घोषणा करने वाली सरकार तब भी आगे के लिए अनभिज्ञ थी। यानी उसे खुद पता नहीं था कि 21 दिन बाद लाक डाउन खोलना भी पड़ेगा या बढ़ाना पड़ेगा।

खैर  जैसे ही 21 दिन पूरे होने को हुए  केंद्र  की  नरेंद्र मोदी सरकार ने  लाक डाउन अगले 19 दिन के लिए  और बढ़ा दिया । अर्थात् केंद्र सरकार 30 जनवरी से 25 मार्च तक के 50 दिनों में, 25 मार्च से 14 अप्रेल तक के 21 दिनों में भी कोरोना महामारी से देश को कैसे लड़ना है  ये तय करने की नीति नहीं बना सकी अगर बना लेती तो मजदूरों और प्रवासियों को अपने गांव पहुंचाने की कोई व्यवस्था कर देती ।

40 दिनों के लाक डाउन के बाद जनता की समझ में अा गया कि सरकार के पास कोई योजना नहीं है और न जाने ये लाक डाउन आगे कब तक चले, इसलिए साधन नहीं होने के बावजूद भी हजारों लाखों मजदूर पैदल ही  निकल पड़े, जिसमें बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं  शामिल थी  ये केंद्र सरकार के प्रति लोगों का पहला अविश्वास था। जो सरकार कि अपीलों के बाद भी अपने घरों को  साधन नहीं होने के बावजूद भी, जाने के लिए  पैदल ही निकल पड़ा था। ये भी पहली अवज्ञा थी सरकार के प्रति कि लोग सरकार के बार बार न निकलने की अपील के बावजूद भी  निकल पड़े। दूसरे लाक डाउन तक तो मजदूरों का धैर्य जवाब दे चुका था

जब तीसरा लाक डाउन 3 मई से शुरू हुआ तो उद्योग जगत को चिंता हुई कि ऐसे कैसे चलेगा उद्योगपतियों को अपने उद्योगों की चिंता सताने लगी।  3 मई तक सरकार ने भी  उद्योगों के लिए भी कोई नीति या रूपरेखा  प्रस्तुत नहीं की थी ।

हां 3 मई के बाद सरकार कहने लगी कि लाक डाउन समाप्ति के बाद उद्योग शुरू होंगे इसलिए मजदूर नहीं निकले लेकिन मजदूर तो  दूसरे लाक डाउन के शुरू होते ही निकल चुके थे और जो कुछ सरकार के प्रति आश्वस्त थे वे  तीसरे लाक डाउन की घोषणा के बाद निकल गए क्योंकि उन्हें लगा कि अब सब अनिश्चित है इसलिए अब अपने घरों को ही जाना उचित है।


54 दिनों की इस अवधि के तीसरे चरण में केंद्र  सरकार ने राज्यों से इस बाबत बात करनी शुरू की क्योंकि सरकार को लगने लगा कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है, राज्यों ने भी उद्योग शुरू करने के प्रस्ताव दिए क्योंकि दूसरे चरण की समाप्ति तक राज्यों के राजस्व का भी बुरा हाल हो रहा था, लेकिन तब तक मजदूर निकल चुके थे  और सरकारों द्वारा फैक्ट्रियां चालू करने की अपील भी मजदूरों को पलायन से नहीं रोक सकी, क्योंकि मजदूर का मन उचट गया था वो हर हाल में एक बार अपने घर पहुंचना चाहता था। इसलिए उस पर किसी भी सरकार की अपील का कोई असर नहीं हुआ और वो साधन न होने के बावजूद भी पैदल ही निकल पड़ा। ये सभी राज्य सरकारों की अवज्ञा थी। लोग मार खा खा कर भी आगे बढ़ रहे थे मानो उन्हें मौत दिखाई पड़ रही थी और वे मरना अपने गांव में ही चाहते थे।  ये एक बार फिर  कोई नीति या योजना न होने के कारण हुआ। 

पहली बात तो अगर केंद्र सरकार के पास पहले ही दिन से कोई योजना होती तो मजदूर अपने घर भी हो आते और  फैक्ट्रियों में काम भी पूरी शक्ति से शुरू हो पाता।
नीति के अभाव में 21 दिन तक तो मजदूर  पहले लाक डाउन की समाप्ति तक तो जैसे तैसे टिके रहे, हालांकि  22 मार्च के जनता कर्फ्यू के बाद 25 मार्च से लागू पहले लाक डाउन से ही अधिकांश मजदूर सड़कों पर उतर पड़े थे क्योंकि वे इस असमंजस में थे कि क्या मालूम ये लाक डाउन कब तक चले, जो बचे थे वे दूसरे लाक डाउन की घोषणा के साथ ही अपने घरों को निकल पड़े और जो रुके थे वे तीसरे लाक डाउन की घोषणा के साथ ही अनिश्चय जान पैदल ही निकल पड़े।

 ऐसी स्थिति क्यों बनती ? अगर सरकार पहले ही दिन अपनी रूपरेखा जनता के सामने रख देती इससे ये होता कि मजदूर अपने घरों को भी हो आते और चौथे लाक डाउन तक उद्योग और फैक्ट्रियां भी पूरी क्षमता से  काम शुरू कर देती क्योंकि मजदूरों की होम सिकनेश की पूर्ति भी हो जाती और वे वापस काम पर भी खुशी खुशी लौट आते।

 कोई योजना  सामने न होने से  अब एक तरफ सरकार उद्योगों  को  शुरू करना चाह रही है दूसरी तरफ मजदूर अपने घरों तक पहुंचे ही है या कुछ पहुंचे भी नहीं है रास्ते में है। इससे उद्योगों में मजदूर नहीं मिल रहे और फैक्ट्रियां पूरी क्षमता से काम शुरू नहीं कर पा रही। इससे पिछले  करीब  दो महीने से पटरी से उतरी अर्थ व्यवस्था को गति नहीं मिल पा रही। रिजर्व बैंक का कहना है कि  इस बार स्थिति माइनस में जा सकती है।

अब इसे प्राकृतिक आपदाओं में सरकार का फेलियर कहा जाएं या कुछ और। सरकारें बनाई ही इसीलिए जाती है संकट के समय जनता को कोई तकलीफ़ न होने दे लेकिन यहां तो जनता पिछले दो महीने से पिस रही है न राज्य सरकारें उनके दुख दूर कर पा रही है और न केंद्र सरकार।
 अब बेरोजगारी के कारण जो भुखमरी का दौर आने वाला है वो और भी भयावह हो सकता है। इसके लिए अभी से सरकारों को सर्वव्यापी योजना बना लेनी चाहिए।  अब मध्यम वर्ग में आत्महत्या, सामूहिक आत्महत्या जैसे केस ज्यादा अा सकते है क्योंकि ये वर्ग जो निजी क्षेत्रों में काम करता था , उनका रोजगार चला गया होगा और वे मुफ्त सरकारी योजना के दायरे में आएंगे नहीं तो उनके पास क्या रास्ता बचेगा?  ऐसेमध्यम वर्गीय लोग पिछले  दो महीनों से जो कुछ बचत थी उसे खो चुके है अब उनके मुफलिसी के दिन शुरू हो गए है, सरकार उन्हें कुछ देगी नहीं, मांगना वे चाहेंगे नहीं तो आखिर कितने दिन चलेगी उनकी गाड़ी।  अब आने वाले समय में समाचार पत्रों में ऐसी खबरें आम हो सकती है जिसमें किसी एक व्यक्ति या पूरे परिवार सहित आत्महत्या करने की खबरें हो।

शुक्रवार, 15 मई 2020

दुख हरो हे जनता! अब भी पैदल चल रहे इन लोगों का

दुख हरो हे जनता!
 अब भी पैदल चल रहे इन लोगों का


वाह रे कोरोना! इनके  दुख को 20 लाख करोड़ के पैकेज ने  दूर नहीं किया। ये अब भी पैदल चल रहे है।इनके लिए कब बसें चलेगी, न इनके पास देने को किराया है न खाने को रोटी और न पीने के लिए पानी के पैसे ही।

सरकारें तो कुछ करें या न करें कुछ लेकिन शहरों और गांवों से गुजरते इन लोगों के लिए सेवाभावी संस्थाएं तो जगह जगह इनके लिए सेवा शिविर लगा ही सकती है जैसे रामदेवरा पैदल जाते लोगों के लिए जगह जगह शिविर लगाएं जाते है निशुल्क खाना ,रहना और मालिश के लिए दर्द निवारक तेल। ताकि इनकी अपने गांव जाने की पैदल यात्रा आसान हो सकें।  मानवता की इससे बड़ी सेवा कोई हो ही नहीं सकती। सरकारों के भरोसे तो ये पलायन रुकता दिखता नहीं। गांव गांव के सेवाभावी लोगों को ही आगे आना होगा उन्हें अपने गांव की सड़कों से गुजरते ऐसे लोगों के लिए गांव के बाहर ही शिविर लगा कर इनकी सहायता करने को, ताकि ये पैदल चलते लोग वहां रुक सकें कुछ देर विश्राम कर सकें, भोजन कर सकें और जब थकान दूर हो जाएं तो वापस अपनी इस यात्रा पर आगे बढ़ सकें।

परिवारों के साथ जा रहे लोगों को एक ही टेंट में तो एकल लोगों को सोशल दिस्टेंगिंग से ठहराए। उनके गांव की सड़क पर पहुंचते ही सेनेताइज करें फिर उन्हें टेंट में भेजें उनके लिए खाने की व्यवस्था हो आराम करने लिए  बिस्तर चद्दरों सहित। जितने दिन वो रुकना चाहे रुके और जब वे चले जाएं तो उस स्थान को पहले सैनेताईज करें फिर उनके उपयोग में लिए गए बिस्तर आदि को 2-3 दिनों तक धूप में रखें फिर उनका उपयोग करें।

ये कोई मुश्किल नहीं बस इच्छाशक्ति की जरूरत है। गांव  में रहने वाले लोगों से ज्यादा तो पलायन वाले लोग नहीं है इसलिए गांव के लोग अगर चाहे तो इन पैदल चलते लोगों का दुख कुछ कम कर सकते है।

सरकारों के वश का नहीं है ये सब जनता अगर चाहे तो कर सकती है। ये पैदल चलते लोग वे है जिनके पास बसों और रेलों का किराया देने की सामर्थ्य नहीं है, अगर होती तो ये श्रमिक ट्रेनों में न अा जाते, उन स्पेशल ट्रेनों में नहीं अा जाते जिनमें राजधानी का किराया लगता है। इनकी मज़बूरी और बेबसी को समझे और अगर आपके गांव की सड़क से ऐसे लोग निकलते दिखे तो उनकी सहायता करें।
देखिए इनके पैरों की हालत नीचे के फोटो में क्या इन्हें कोई शौक है इस तरह पैदल चलने का।  कोई रास्ता नहीं दिखा तो ये चल पड़े है पैदल ही। क्या मानवता , हमारा धर्म नहीं कहता कि ऐसे लोगों की सहायता को हम आगे आएं।

ऐसे लोगों की मदद ही सच्ची सेवा है। उन गांवों के लोगों को भगवान ने सेवा का मौका दिया है जिन गांवों की सड़कों से ये लोग गुजर रहे है। इनके दिलों से निकली सच्ची दुआएं ही आपके जन्म जन्मांतर को सुखमय बना सकती है। इनकी सेवा भगवान की सेवा से भी बढ़कर होगी।

बुधवार, 13 मई 2020

ऐसे बनेगा लोकल ही वोकल

लोकल को बनाना है वोकल



प्रधानमन्त्री जी ने लोकल को वोकल बनाने की जो बात कही है उस पर लोकल लोगों को और लोकल उत्पादन करने वाले उद्योगपतियों दोनों को चिंतन करने की जरूरत है। लोकल चीज अगर अच्छी क्वालिटी की मिलेगी तो लोग उसे खरीदने में प्राथमिकता देंगे और अगर उसकी क्वालिटी घटिया होगी तो लोग दूसरी खरीदेंगे।  इसलिए लोकल को वोकल बनाने के लिए  क्वालिटी का जो ध्यान रखेगा वो अपने उत्पाद को वोकल बना सकेगा, और जो क्वालिटी का ध्यान नहीं रखेंगे उनके लिए चाहे प्रधानमन्त्री कहे या कोई भी, जनता उसे स्वीकार नहीं करेगी।
इसलिए लोकल को अगर वोकल बनाना है तो क्वालिटी का ख्याल रखना होगा। चीनी आइटम की तरह नहीं कि, सस्ती तो हो लेकिन क्वालिटी न हो। बाज़ार में लंबे समय तक टिकने के लिए जरूरी है कि आप अपनी क्वालिटी मेंटेन रखें। निश्चिंत मानिए अगर आप क्वालिटी बनाए रखेंगे तो भी आपकी लोकल होने की वजह से अन्य चीजों से आपकी दरें,बड़ी कम्पनियों से कम ही होगी। और कुछ नहीं तो जो ट्रांसपोर्टेशन का खर्चा है वो तो कम होगा ही, ऐसे में बड़ी बड़ी कम्पनियों कि क्वालिटी मेंटेन रखते हुए आप लोकल लोगों को उसी क्वालिटी की वस्तुएं सस्ती दे सकते है, और जब अच्छी क्वालिटी की कोई चीज सस्ती मिलेगी तो कोई क्यों दूसरी या विदेशी चीज खरीदेगा।

बस तय लोकल को वोकल बनाने का करना है तभी प्रधानमन्त्री की बात बनेगी अन्यथा भाषण है और भाषण तक ही रह जाएगी लोकल को वोकल बनाने की बात।

बुधवार, 4 मार्च 2015

आप पार्टी मे वर्चस्व की लडाई शुरू

आप पार्टी मे वर्चस्व की लडाई शुरू हो गई है . आप के नेता जिन्होने इस पार्टी को सींचा है वे ही अब अपना वजूद चाहने लगे है और ये सही भी है कि जब कोई पेड बडा हो जाए तो उसके फल की चाह उन सभी को होती है जिन्होने उसे लगाया है .पेड लगाने के लिए जमीन को तलाश कर उसे लगाना और फिर उसे प्रतिरोपित करना ,फिर उसकी देखभाल करने से लेकर उसमे फल लगने तक साथ रहने वाले सभी लोग उसके फल की चाह रखते है और वे समझते है कि पहला फल चखने का पहला अधिकार उनका है और ये मानवीय प्रव्रति है ,लेकिन होता क्या है कि ,पौधा लगने तक तो कुछ लोग ही होते है लेकिन जब वो पौधा अच्छा पेड बनता अन्य लोगो को दिखता है तो वे भी उस पेड को सीचने मे जुट जाते है ,कारवा थोडा ज्यादा हो जाता है लेकिन पोधे के लिए जमीन तलाशने वाले और उसे प्रस्थापित करने वाले उस पर अपना अधिक अधिकार मानते है और जब पेड पहला फल देता है तो वे उस पर पहला हक अपना मानते है जबकि बाद मे जुटने वाले भी उसी फल को पहले अपना मानते है और ऐसे शुरू होता है वर्चस्व का दौर . आप बतावे कि पहला हक किसका है ? पेड के लिए जमीन तलाश कर उसे प्रतिस्थापित कर उसे पौधा बनाने वाले लोगो का ?अथवा पौधा बनने के बाद उसे पेड बनाने मे सहयोग करने वाले लोगो का ? या सभी का बराबर अधिकार है पहला फल चखने का . आप पार्टी मे पहला फल पका हुआ दिल्ली की सत्ता रूपी बागडोर का है जिसे सभी अपना बता कर श्रेय लेना चाहते है .हालाकि धीरज रहे तो इस पेड मे कई और फल लग सकते है लेकिन पहले फल को ही पाने की लालसा ने इसा पार्टी मे ये नौबत ला दी है .अब देखना है कि कौन धीरज से संतोश से इसे खाने को राज़ी होता है और कौन उतावली मे है